Tuesday, June 28, 2011

दिल्ली पोयट्री में "एक पल की उम्र लेकर"

२४ जून की शाम सजीव सारथी को दिल्ली के अमेरिकन सेंटर, में दिल्ली पोयट्री के कार्यक्रम में बतौर फीचर्ड कवि आमंत्रित किया गया. दिल्ली पोयट्री, दिल्ली के सम्मानित कविता समूह में से एक है, जो दिल्ली के सभी स्थानों पर माह में ३० दिन कविता की महफ़िल रोशन करने का एक बड़ा सपना लेकर पिछले ४ सालों से काम कर रही है. इसके संचालक हैं अमिता दहिया "बादशाह" जो खुद भी एक जाने माने कवि हैं.



कार्यक्रम में हिंदी और अंग्रेजी के कई युवा और वरिष्ठ कवियों ने कविता पाठ किया. सजीव की कवितायें "दीवारें", "ऐसी कोई कविता", और "विलुप्त होते किसान" बेहद पसंद किये गए. कार्यक्रम का कुशल संचालन खुद अमित जी ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में किया. दिल्ली पोयट्री ने सजीव की पुस्तक "एक पल की उम्र लेकर" को बिक्री के लिए भी अपने काउंटर पर जगह दी.

गौर तलब है कि सजीव ने अपना पहला मंचीय कविता पाठ दिल्ली पोयट्री के ही एक कार्यक्रम में किया था करीब चार साल पहले. और आज यहाँ अपनी पुस्तक के साथ उपस्तिथ होना सजीव के लिए एक वृत्त का घूमकर वापस अपनी जगह पर आने जैसा है. दिल्ली पोयट्री के चुने हुए १०० कवियों में से भी सजीव एक थे. हम उम्मीद करेंगें कि दिल्ली पोयट्री अपने शुभ उद्देश्यों में और कामियाब हो ताकि हमें सजीव जैसे और भी प्रतिभाशाली कवि मिल सकें.  

Monday, June 27, 2011

पुराने ज़ख्म खुल गए - रवि मिश्रा

आपकी 'एक पल की उम्र लेकर' पढ़ी और आपसे ईर्ष्या हो रही है. यक़ीन जानिए इस जलन में भी तारीफ़ है, मुहब्बत है. एक अहिन्दी प्रदेश का वासी न सिर्फ हिंदी जानता है, बल्कि हिंदी जीता है. ये मामला हिंदी प्रदेश के वासियों के लिए भूखमरी सरीखा है. जहाँ हिंदी सरकारी गोदामों में अनाज की तरह भरी पड़ी है, लेकिन फिर भी भूखमरी है.
खैर.....आपकी हर रचना अपने आप में बिलकुल ताज़ी है. मैं काफ़िये का हिमायती हूँ. मुझे लगता है की काफ़िये के दायरे में रहकर कोई बड़ी बात कहना बड़ी बात है. लेकिन मुझे ये भी पता है की काफ़िये के परे भी कवितायेँ हैं, शायरी है. बल्कि ये बेहद वृहद् और जटिल भी है. काफ़िया मिलाने में कम से कम इस बात की गुंजाईश तो रहती है कि सामईन 'अच्छी कोशिश कहकर आपको मुआफ़ कर दें. लेकिन बगैर काफ़िये में इस बात का डर हमेशा बना रहता है कि 'ये क्या है' के पत्थर बरस सकते हैं. लेकिन आपकी कलम कमाल है. बागी काफ़िये के भी तरन्नुम कि लज़्ज़त है. विषय बेहद जाने - पहचाने...फिर भी अजनबी से.

अच्छा लगा. पुराने ज़ख्म खुल गए.

आपकी कवितायों से साफ़ हो जाता है कि आप केरल के हैं. हर दूसरे - तीसरे पृष्ठ पर उसकी हरियाली दिखती है. एक बुरी आदत है आपकी कवितायों में. गाहे - बगाहे माज़ी में ले जाते हैं. टीस सी उठती है. आह सी निकलती है. कहीं कुछ फिर से बिखर जाता है. वक़्त महबूबा सी जो होती है. एकबार रूठकर चली जाये तो लौटकर नहीं आती. बस उसकी याद आती है. आपकी कवितायेँ उसी सफ़र पर ले जाती हैं.
मुझे आप शायर कम फोटोग्राफर ज्यादा लगे, जो लफ़्ज़ों से फोटोग्राफी करता है. आपका हर फोटो अपने आप में तारीख़ है. मुझे यक़ीन है कि आज से दसेक साल बाद जब नयी पीढ़ी पुराने समाज कि तलाश करेगी, तो आपकी कवितायेँ इसे मरे, भूले - बिसराए समाज का पता बतायेंगी. जहाँ हाथ में छड़ी थामे मास्टरजी होंगे. मस्ती में झूमते बच्चे होंगे. उनके बसते होने और उनमे भी तमाम दुनिया होगी. लेकिन उतनी भरी नहीं, जितनी कि तब होगी. हम जैसों को भी अपने माज़ी में लौटने का शार्टकट मिलता रहेगा.

शुक्रिया हमारे दिल की बात कहने के लिए.

इति

रवि
फिल्मकार और कवि

Tuesday, June 21, 2011

Rishi S Commented

A wonderful collection of poems which reflect Sajeev's care for relationships, passion for the country and concern for society.I am privileged to have had the opportunity to tune some of these poems.

Rishi S,
Composer, Hyderabad

Wednesday, June 15, 2011

कवियित्री रश्मि प्रभा लिखती हैं


सजीव सारथी ... इनकी पुस्तक की समीक्षा से पहले मैं इनकी खासियत बताना चाहूँगी . सजीव सारथी यानि एक जिंदा सारथी उनका स्वत्व है, उनकी दृढ़ता है, उनका मनोबल है,उनकी अपराजित जिजीविषा है .... हार मान लेना इनकी नियति नहीं , इनसे मिलना , इन्हें पढ़ना , इनके गीतों को सुनना जीवन से मिलना है . हिंद युग्म के आवाज़ http://podcast.hindyugm.com/ से मैंने इनको जाना , पहली बार देखा प्रगति मैदान में हिन्दयुग्म के समारोह में .... कुछ भावनाओं को शब्द दे पाना मुमकिन नहीं होता , फिर भी प्रयास करते हैं हम और .... लोग कहते हैं जताना नहीं चाहिए , पर जताए बिना हम आगे कैसे बढ़ सकते ये कहकर कि इस अनकही पहेली को सुलझाओ ....मैं भी नहीं बढ़ सकती, यूँ कहें बढ़ना नहीं चाहती . अपने 'आज' से संभवतः सजीव जी को कहीं शिकायत होगी, पर मेरे लिए वह कई निराशा के प्रेरणास्रोत हैं और उनकी इसी प्रेरणा के ये स्वर हैं


और है उनका यह संग्रह 'एक पल की उम्र लेकर' !
अपनी पहली रचना 'सूरज' में कवि सूरज से एहसास हाथ में लेकर भी सूरज को मीलों दूर पाता है और इस रचना में मैंने सूरज को कवच की तरह पाया ... जो कवि से कवि के शब्द कहता है -

"मैं छूना चाहता हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहता हूँ
पर ....
तुम कहीं दूर बैठे हो"


कवि सूरज को सुनता है (मेरी दृष्टि , मेरी सोच में) और भ्रमित कहता है-

'तुम कहते तो हो ज़रूर
पर आवाजों को निगल जाती हैं दीवारें ...'
फिर अपनी कल्पना को देखता वह कहता है -
'याद होगी तुम्हें भी
मेरे घर की वो बैठक
जहाँ भूल जाते थे तुम
कलम अपनी ...'


दूसरों की तकलीफों को गहरे तक समझता है कवि, तभी तो चाहता है ...

"काश !..........
मैं कोई ऐसी कविता लिख पाता
कि पढनेवाला पेट की भूख भूल जाता

...
पढनेवाला अपनी थकान को
खूंटी पर उतार टाँगता
....
देख पाता अक्स उसमें
और टूटे ख़्वाबों की किरचों को जोड़ पाता
...काश !'


समसामयिक विषय पर भी कवि ने ध्यान आकर्षित किया है और करवाया है -

'गाँव अब नहीं रहे
प्रेमचंद की कहानियोंवाले
...........
सभ्यता के विकास में अक्सर
विलुप्त हो जाती हैं
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ
.........
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते
जुम्मन और होरी आज
विलुप्त हो रहा है किसान !'


प्रतिस्पर्द्धा, सबकुछ पा लेने की जी तोड़ दौड़, हर फ्रेम को अपना बना लेने की मानसिकता ने बच्चों से पारले की मिठास छीन ली है
तभी तो -

'स्कूल से लौटते बच्चे
काँधों पर लादे
ईसा का सलीब '
.... से दिखाई देते हैं !

और ऐसे में ही अपने बचपन की उतारी केंचुली हमें मनमोहक नज़र आने लगती है. और अनमना मन
कहता है -

'ऐसा स्पर्श दे दो मुझे
संवेदना की आखिरी परत तक
जिसकी पहुँच हो ...'


अन्यथा ईश्वर प्रदत्त कस्तूरी से अनजान मनुष्य कामयाबी की गुफा में अदृश्य होने लगता है , जिसे कवि की ये पंक्तियाँ और स्पष्ट करती हैं -

'कामयाबी एक ऐसा चन्दन है
जिससे लिपट कर हँसता है
नाग - अहंकार का'


ज़िन्दगी जाने कितने रास्तों से गुजरती है , पर सबसे नाज़ुक रास्ता प्यार का लचीली पगडंडियों सा होता है ... हर शाम देता है दस्तक, कभी हंसकर ,
कभी नम होकर और इस डर से कि,

'जाने कब वो लौट जाए ...
समेट लेता हूँ
अश्कों के मोती
और सहेज के रख लेता हूँ ....'


प्यार, त्याग, स्पर्श, ख्याल, मासूमियत, ताजगी सबकुछ है इस 'एक पल की उम्र लेकर ' में . बस एक पन्ना पलटिये और शुरू से अंत तक का सफ़र तय कर लीजिये. फिर - बताइए ज़रूर , क्या इन पलों की सौगात अनमोल नहीं !!!

Monday, May 30, 2011

अनुराग यश लिखते हैं....


"एक पल की उम्र लेकर" सजीव सारथी की ६८ अदभुत कविताओं का संकलन है. काफी दिनों बाद कुछ ऐसा पढ़ने को मिला है जो कि 'गागर में सागर' भरने जैसा है. रचना 'विलुप्त होते किसान' जहाँ आपको धरती से जोड़ कर आन्दोलित करते हैं वहीँ लेखक की एक कविता शीर्षक 'ऐसी कोई कविता' पाठक को ठंडक देती है. कविता 'नौ महीने' एक कठोर सत्यता का एहसास कराती है तो वहीँ 'स्पर्श की गर्मी' शीर्षक कविता आपको अंदर तक भिगो कर रख देती है. कवि का देश प्रेम दिखता है 'सुलगता दर्द-कश्मीर में' और अन्य कवितायें जैसे ठप्पा, जंगल, गिरेबाँ, सूखा अलग अलग विषय होते हुए भी आपको मैथ कर रख देती है, अंत में दस क्षणिकाओं में से एक क्षणिका 'पेंडुलम' एक बुद्धिजीवी व्यक्ति की व्यथा है जो कि सजीव सारथी ने सजीव कर दी है. मेरा अपना मत है कि ये संकलन अपने आप में इतना मुक्कमल है कि अब लेखक को अब आगे न कुछ लिखने की अवश्यकता है और न समाज को कुछ और देने की.


यश

(लेखक, निर्माता, निर्देशक)

Tuesday, May 17, 2011

Nau Mahine - The Awakening Series - A Short Film based on "Ek Pal Kii Umr Lekar"

Nau Mahine - The Awakening Series - A Short Film based on "Ek Pal Kii Umr Lekar" a book released by Heavenly Baby Books publication

In India, there are less than 93 women for every 100 men in the population.

The accepted reason for such a disparity is the practice of Female Infanticide in India,

If motherhood is a bliss....
A girl child is a blessing...

Dont kill her in the womb...

This is the message we want to convey through this short film, credits are as follows, do send us your views and opinions

Poem, Script and Direction - Sajeev Sarathie
Editor - Joy Kumar
Music - Rishi S
Voice Over - Pradeep Sharma
Publishing Partner - Heavenly Baby Books