Sunday, July 3, 2011

Ek Pal Kii Umr Lekar is Now on Flipkart

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Ek Pal Kii Umr lekar @ Flipkart

हर एक बात अपनी बात-सी लगती है

मैं आज तक फिल्मी गीतों की समीक्षा करता आया हूँ, लेकिन पहली मर्तबा किसी कविता-संग्रह की समीक्षा करने का मौका हासिल हुआ है। यह मौका दो कारणों से मेरे दिल के करीब है.. एक तो इसलिए कि ये सारी कविताएँ नए दौर की कविताएं है, जो आज के हालात का बखूबी चित्रण करती है और दूजा ये कि इन कविताओं के रचयिता मेरे बड़े हीं प्यारे कवि-मित्र हैं। सजीव सारथी जी का नाम अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा के प्रेमियों के लिए नया नहीं है.. बस इस बार नया यह हुआ है कि सजीव जी अंतर्जाल से उतरकर पन्नों पर आ गए हैं। "एक पल की उम्र लेकर" इनका पहला कविता-संग्रह है। मैं इनके कविता-संग्रह की समीक्षा करूँ, इससे पहले पाठकों को यह यकीन दिलाना चाहता हूँ कि मेरी समीक्षा पर इनकी मित्रता का कॊई कुप्रभाव न होगा :) .. मेरी समीक्षा तटस्थ हीं रहेगी..

सजीव जी की कविताओं की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इनकी लिखी हर एक बात अपनी बात-सी लगती है,
हर खुशी अपनी हीं किसी खुशी की याद दिलाती है, हर ग़म अपने हीं बीते हुए किसी ग़म का बोध कराता है। ये हर एक अनुभव को अपने अनुभव से पकड़ते हैं। ये जिस आसानी से हँसी लुटाते हैं, उतनी हीं आसानी से आँसुओं की भी बौछार कर डालते हैं। ११० पन्नों के इस कविता-संग्रह में हर तरह के भाव हैं। इनके यहाँ कथ्य का दुहराव नहीं है। ये उन कवियों की तरह नहीं हैं, जिन्हें अगर एक बार ज़िंदगी में बुरे लम्हे नसीब हुए तो उनका लेखन हीं निराशावाद की तरह मुड़ जाता है.. फिर हर एक पंक्ति में उसी दु:ख के दर्शन होते हैं। सजीव जी दु:ख और सुख को तराजू के दोनों पलड़ों पर बराबर का स्थान देते हैं, इसलिए इनकी कविताओं को पढते वक़्त पाठक कोई एक मनोभाव बरकरार नहीं रख सकता। एक पाठक को महज कुछ हीं कविताओं में जीवन के सारे उतार-चढाव दिख जाएँगे।

"साहिल की रेत" कविता में जब कवि अपने पुराने सुनहरे दिनों को याद करता है तो अनायास हीं उसे इस बात का बोध हो जाता है कि जो भी लम्हे हमने गंवा दिए वही काफी थे, जीने के लिए। उन्हें ठुकराकर भी प्यास मिटी तो नहीं।

उन नन्हीं
पगडंडियों से चलकर हम
चौड़ी सड़कों पर आ गए
हवाओं से भी तेज़
हवाओं से भी परे
भागते हीं रहे
फिर भी
प्यासे हीं रहे...


किसी पुराने प्यार, किसी पुरानी पहचान को भुलाना आसान नहीं होता। वह इंसान भले हीं हमारी ज़िंदगी से चला जाए, लेकिन उसकी यादें परछाई बनकर हमारे आस-पास मौजूद रहती है। कुछ ऐसे हीं ख़्यालात "बहुत देर तक" कविता में उभरकर सामने आए हैं:

बहुत देर तक
उसके जाने के बाद भी
ओढे रहा मैं उसकी परछाई को..

बड़े शहरों में छोटे शहरों या गाँवों से मजूदरों का पलायन कोई नई बात नहीं है। यह बात भी किसी से छुपी नहीं कि इन लोगों के साथ कैसा सलूक किया जाता है। ये भले हीं उनके समाज में घुल जाना चाहें, लेकिन बड़े लोगों का समाज इन्हें गैर या प्रवासी हीं बने रहने देना चाहता है। ऐसे प्रवासियों का दर्द और खुद पर गुमान सजीव जी की इस एक पंक्ति से हीं स्पष्ट हो जाता है। कविता है "किसका शहर":

उन सर्द रातों में
जब सो रहे थे तुम
मैं जाग कर बिछा रहा था सड़क..


गाँवों से मजदूरों और किसानों का पलायन केवल केरल तक सीमित नहीं है। यह अलग बात है कि सजीव जी ने केरल के गाँवों की स्थिति अपनी आँखों से देखी है। इसलिए इन्होंने "विलुप्त होते किसान" में हाशिये पर पड़ी इन प्रजातियों पर गहरी टिप्पणी कर डाली है:

सभ्यता के विकास में अक्सर
विलुप्त हो जाती हैं
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ..


ज़िंदगी से छोटे-छोटे लम्हे बटोर लाना सजीव जी की आदत-सी है शायद। तभी तो इन्होंने किसी की उम्र में "नौ महीने" जोड़ दिए तब हमें मालूम हुआ कि उम्र कहीं छोटी पड़ रही थी। ये नौ महीने जितना एक लडके के लिए मायन रखते हैं, उतना हीं एक लड़की के लिए.. या फिर कहिए कि लड़की के लिए ज्यादा... क्योंकि लड़कियों के लिए वे नौ महीने गुजारने ज्यादा मुश्किल होते हैं... मौत कब गले पड़ जाए कोई नहीं जानता... इस कविता के लिए मैं सजीव जी को विशेष दाद दूँगा।

शिनाख्त उनकी होती है, जिन्हे जीने का हक़ होता है और जो ज़िंदगी को अपने बूते पर जीता है। वह तो बे-शिनाख्त हीं मारा जाएगा, जो रोड़े की तरह पाँव के ठोकर खाता हुआ इधर-उधर फेंका जा रहा हो। दिल्ली-मुम्बई जैसे शहरों में बिहार के पिछड़े गाँव से आने वाले किसी मजदूर (हाँ, वही पलायन की दु:ख भरी दास्तां) की किसने जेब मारी, किसने किडनी और किसने ज़िंदगी.. इसकी कौन खबर लेता है। ये मजदूर और इनके परिवार वाले तो यही मानते हैं कि स्वर्ग के दर्शन हो रहे हैं, लेकिन जो होता है उसका जीता-जागता ब्योरा सजीव जी की "बे-शिनाख्त" कविता में है। सच हीं लिखा है आपने:

और किसी को कानों-कान
खबर भी नहीं लगती..


प्यार... बड़ा हीं प्यारा अनुभव है। इसमें जीत क्या और हार क्या... प्यार को अगर शतरंज की बाजी की तरह समझा जाए तो सजीव जी की "शह और मात" कविता हर चाल के साथ फिट बैठती है और फिर... इन पंक्तियों के क्या कहने:

मैंने खुद को विजेता-सा पाया
जब तुमने मुस्कुराते होठों से कहा -
यह शह है और ये मात।


दंगों में बस इंसान हीं ज़ाया नहीं होते.. इंसान के द्वारा गढे गए शब्द भी अपना अर्थ खो देते हैं। दोस्ती, प्यार, विश्वास, इंसानियत.. ऐसे न जाने कितने शब्दों की मौत हो आती है। "शब्द" कविता में कवि इन्हीं आवारा शब्दों की शिकायत करते हुए कहता है कि:

शब्द
जो एक अमर कविता बन जाना चाहते थे
कुछ दिन और ज़िंदा रह जाते-
अगर जो खूँटों से बँधे रहते।


कश्मीर.. यह क्या था, इसे क्या होना था.. लेकिन यह क्या होकर रह गया है.. इस सुलगते शहर में अब दर्द भी सुलगते हैं। आँखों में रोशनी की जगह गोलियों के सुराख ... आह! इस दर्द को महसुस करना हो तो "सुलगता दर्द-कश्मीर" एक बार ज़रूर पढ लें।

कहा था ना कि दर्द और प्यार.. खुशी और ग़म.. हर तरह के अनुभव सजीव जी के इस संग्रह में मौजूद है। तो लीजिए.. अगली हीं कविता में "हृदय" की कोमलता से रूबरू हो आईये। क्या खूब कहा है कवि ने:

क्या करूँ, मुश्किल है लेकिन
खुद से हीं बचकर गुजरना।


"एक पल की उम्र लेकर" कविता-संग्रह में न सिर्फ़ उन्मुक्त छंद हैं, बल्कि कई सारी ग़ज़लें भी हैं। उन्हीं में से एक है "रूठे-रूठे से हबीब"। इस ग़ज़ल के एक शेर में कवि इस बात का खुलासा कर रहा है कि आजकल प्रेम परवान क्यों नहीं चढता?

कहाँ रहा अब ये प्रेम का ताजमहल,
ईंट-ईंट में अहम के किले हैं कुछ..


दूसरी ग़ज़ल है "भूल-चूक"। दंगे-फ़सादों में जब भी किसी इंसान की जान ली जाती है तो उस समय एक इंसान नहीं एक धर्म निशाने पर होता है और निशाना भी एक धर्म की ओर से हीं लगाया जाता है। उस वक़्त कोई गीता की शपथ लेता है तो कोई क़ुरआन के कलमें पढता है। इसी लिए कवि ने कहा है कि:

कोई अल्लाह तो कोई राम रट कर कटा है,
चौक पर रूसवा हुई है फिर कोई किताब शायद..


मंज़िल उन्हीं को हासिल हुई है, जिन्होंने रास्तों की खोज़ की है। कुएँ के मेढक की तरह सिमटकर बैठे रहने से कुछ भी हासिल नहीं होता। कभी न कभी अनजान दिशाओं की ओर बढना हीं होता है। कभी न कभी नाखुदा से ज्यादा खुद पर भरोसा करना होता है। सजीव जी अपनी इन बातों को रखने में पूरी तरह से सफल हुए हैं:

आओ वक़्त के पंखों को परवाज़ दें,
एक नयी उड़ान दें
अनजान दिशाओं की ओर।


सदियों से इंसान के सामने सबसे बड़ा यक्ष-प्रश्न यही रहा है कि वह आया कहाँ से है। आज तक इसका उत्तर कोई जान नहीं पाया है। फिर भी वक़्त-बेवक़्त हर कहीं यह प्रश्न किसी न किसी रूप में सामने आता हीं रहता है। "कफ़स" कविता में यह प्रश्न कुछ इस तरह उभर कर आया है:

आसमान पे उड़ने वाले परिंदे की
परवाज़ जो देखी तो सोचा कि-
मेरी रूह पर
ये जिस्म का कफ़स क्यों है?


एक कवि किस हद तक सोच सकता है यह जानना हो तो सजीव जी की "सूखा" कविता पढें जहाँ ये कहते हैं कि:

मेरे भीतर-
एक सूखा आकाश है।


"सिगरेट" न सिर्फ़ जिगर को खोखला करता है, बल्कि ज़िंदगी जीने के जज्बे को भी मार डालता है। इंसान अपने ग़म मिटाने के लिए सिगरेट की शरण ले तो लेता है, लेकिन जब उसे अपने अंतिम दिन सामने नज़र आते हैं तब जाकर शायद उसे इस बात का पता चलता है कि:

मगर जब देखता हूँ अगले हीं पल
ऐश-ट्रे से उठते धुवें को
तो सोचता हूँ,
ज़िंदगी -
इतनी बुरी भी नहीं है शायद।


इस संग्रह में और भी कई सारी अच्छी कविताएँ, ग़ज़लें एवं क्षणिकाएँ हैं, लेकिन सब का ज़िक्र यहाँ मुमकिन नहीं है। इसलिए मैंने उनमें से अपनी पसंद की पंक्तियाँ चुनकर उनकी समीक्षा की है। हो सकता है कि पाठक को या फिर दूसरे किसी समीक्षक को कोई और पंक्तियाँ ज्यादा पसंद हों। अपनी-अपनी राय है.. अपना-अपना मंतव्य है। अगर पूरे संग्रह की एक बार बात की जाए तो हर कविता का अंत बेहतरीन है। इस मामले में मैं सजीव जी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ कि वे जानते हैं कि कौन-से शब्द और कौन-से वाक्य कहाँ रखे जाने हैं।

चूँकि शुरूआत में मैंने कहा था कि मेरी समीक्षा तटस्थ होगी, तो मैंने संग्रह में दो-चार ऐसी भी पंक्तियाँ ढूँढ निकाली हैं, जहाँ या तो मैं थोड़ा दिग्भ्रमित हुआ या फिर मुझे लगा कि शिल्प थोड़ा ठीक किया जा सकता था।

उदाहरण के लिए "पराजित हूँ मैं" कविता की इन्हीं पंक्तियों को लें:

मेरा रथ हीं तो दलदल में
फँसाया था तुमने
मेरा वध हीं तो छल से
कराया था तुमने।


मेरे हिसाब से अगर "हीं" को "रथ" और "वध" के पहले रखते तो अर्थ ज्यादा साफ़ होता। तब यह अर्थ निकलता कि "मेरा" हीं रथ ना कि "किसी" और का। "हीं" को बाद में रखने से वाक्य का जोर "रथ" और "वध" पर चला गया है, जो कि "मेरा’ पर होना चाहिए था।

अगली कविता है "संवेदनाओं का बाँध"। इस कविता के अंतिम छंद को मैं सही से समझ नहीं पा रहा हूँ।

मन की हर अभिव्यक्ति को
शब्दों में ढल जाने दो
कोरे हैं ये रूप इन्हें
कोरे हीं रह जाने दो।


यहाँ शुरू की दो पंक्तियों में कवि यह कहना चाहता है कि मेरी हर अभिव्यक्ति को आवाज़ मिले, शब्द मिले। लेकिन अंतिम दो पंक्तियों में "कोरे" को "कोरे" रह जाने दो.. कहकर "अभिव्यक्ति" को "अभिव्यक्ति" हीं रहने देने की बात हो रही है या फिर कुछ और? मैं चाहूँगा कि सजीव जी मेरी इस शंका का समाधान करें।

"आलोचना" वाली श्रंखला की अंतिम कविता है "आज़ादी"। इस कविता की एक पंक्ति में कवि ने "कारी" शब्द का इस्तेमाल किया है। मेरे हिसाब से कारी "काली" का हीं देशज रूप है। यह मानें तो पंक्ति कुछ यूँ बनती है:

उफ़्फ़ ये अँधेरा कितना काली है..

अब यहाँ "लिंग-दोष" आ गया है, क्योंकि अंधेरा पुल्लिंग है। अँधेरा की जगह अगर तीरगी को रखें तो यह दोष जाता रहेगा..

बड़ी हीं मेहनत-मशक्कत के बाद मैं इस कविता-संग्रह में बस ये तीन कमियाँ (शायद) निकाल पाया हूँ। बाकी तो आपने ऊपर पढ हीं लिया है।

मैं अपनी इस समीक्षा को विराम दूँ, उससे पहले सजीव सारथी जी को इस कविता-संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाईयाँ देना चाहूँगा और दुआ करूँगा कि उनके ऐसे और भी कई सारे संग्रह निकलें।

एक बात और... इस पुस्तक का जब भी दूसरा संस्करण निकले या फिर आपका कोई नया पुस्तक आए, तो इस बात का ज़रूर ध्यान रखें कि उर्दू के शब्द उर्दू जैसे हीं दिखें यानि कि नुख़्ते को नज़र-अंदाज़ न किया जाए।

विश्व दीपक
कवि, गीतकार और सोफ्टवेयर इंजीनियर

Tuesday, June 28, 2011

खुशबुओं की एक पूरी दुनिया


शनिवार २५ जून की वो शाम बेहद ख़ास थी, जहाँ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, दिनेश कुमार शुक्ल और शिवमंगल सिद्धान्तकर जैसे साहित्य जगत के बड़े हस्ताक्षर मौजूद हों, और वहाँ अगर युवा कवि सजीव सारथी की पहली काव्य पुस्तक "एक पल की उम्र लेकर" की चर्चा होनी हो तो वह शाम ख़ास अपने आप हो जाती है. दिल्ली के मशहूर सिरी फोर्ट सभागार के पास बसे एकेडमी ऑफ़ फाईन आर्ट एंड लिटरेचर में आयोजन था "डायलोग" मंच का. जो हर माह के अंतिम शनिवार को रोशन होती है कविता की नयी बयार लेकर. हिंदी उर्दू और पंजाबी साहित्कारों की ये गोष्ठी दक्षिण दिल्ली में खासी लोकप्रिय है. इस काव्य गोष्ठी की सबसे बड़ी खासियत ये होती है की यहाँ सब बेहद अनौपचारिक होता है बिलकुल जैसे घर की बात हो, सभी नए और वरिष्ठ कवि एक साथ एक प्लेटफोर्म को शेयर करते हैं और कविता पर खुल कर चर्चा और बहस होती है. 

इस महफ़िल को अपने संचालन से चार चाँद लगते हैं वरिष्ठ कवि और वक्ता मिथिलेश श्रीवास्तव. २५ जून को भी ठीक शाम ५ बजे कार्यक्रम विधिवत रूप से आरंभ हुआ. कुछ श्रोता आ चुके थे, कुछ आने बाकी थे. हाल ही में हम सब से बिछड़े महान चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन को अश्रुपूर्ण ह्रदय से याद किया गया, साथ ही एक कवि साथी रंजीत वर्मा की दिवंगत माता जी के लिए कुछ पलों का शोक रखा गया. इसके पश्चात सजीव सारथी की पुस्तक "एक पल की उम्र लेकर" का दक्षिण दिल्ली विमोचन हुआ ब्रिजेन्द्र जी और दिनेश जी के शुभ हाथों से. इसके बाद मिथिलेश जी ने कमान संभाली और सजीव के काव्य संग्रह पर एक दिलचस्प सी टिपण्णी की. उन्होंने कहा कि सजीव सरल हैं और संकोची भी मगर एक अच्छे इंसान और प्रतिभाशाली कवि हैं, उनकी कवितायें नोस्टेलेजिक होते हुए भी मानुषी संवेदनाओं को अनेक स्तरों पर कुरेदती हुई बहती हैं, इसमें विस्थापन का दर्द भी है और पकृति विरोधी विकास के प्रति आक्रोश भी, सुनिए पूरी चर्चा इस यू ट्यूब वीडियो में...





ब्रिजेन्द्र जी ने कहा कि आम तौर पर दक्षिण के लेखक जब हिंदी का इस्तेमाल करते हैं तो क्लिष्ट संस्कृत शब्दों में अपनी बात कहते हैं पर सजीव की कविताओं में हिंदी और उर्दू के सरल शब्द बहुत स्वाभाविक रूप से आते हैं, उनकी कविताओं को पढकर निश्चित ही कहा जा सकता है कि उनमें आपार संभवानाएं मौजूद हैं जो आगे चलकर और भी मुखरित होंगीं. सुनिए पूरी बात -



सजीव ने कुछ कविताओं का वाचन भी किया. उनके वाचन में बेशक अनुभवी कवियों जैसे भाषा प्रवहता न हो मगर एक सच्चाई अवश्य झलकती है. अच्छी कवितायें लिखने के साथ साथ उन्हें मंच पर बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने का भी हुनर उन्हें अभी सीखना पड़ेगा. खैर सुनिए उनकी जुबानी उन्हीं की कवितायें.




यहाँ कुछ कवि ऐसे भी थे जो विशेषकर इस आयोजन में शामिल होने के लिए आये सजीव के कारण. उनके लिए सजीव कवि कम और एक मित्र अधिक हैं. सुनीता शानू जो सजीव को अपना छोटा भाई मानती है तमाम दिक्कतों को पार कर दिल्ली के दुसरे सिरे से यहाँ पहुंची तो दीप जगदीप अपने जीवन संगनी को साथ लेकर आये कार्यालय से आधे दिन की छुट्टी लेकर, मगर १०० किलोमीटर की दूरी तय कर गजरौला से ४ घंटे का सफ़र कर दिल्ली पहुंचे युवा कवि अखिलेश श्रीवास्तव का तो कहना ही क्या, देखिये कविता वाचन से पहले उन्होंने अपने साथी कवि सजीव की किन शब्दों में प्रशंसा की. 

अखिलेश ने इसके बाद जो काव्य धारा बहाई वो लाजवाब थी, मगर उसका उल्लेख फिर कभी. उनके आलावा स्वप्निल तिवारी, रजनी अनुरागी, रेनू हुसैन, सुनीता शानू, अजय नावरिया और तेजेंद्र लूथरा सरीखे कवियों ने अपने शाब्दिक जौहर का नमूना खुले दिल से पेश किया. हम आपको बता दें की वरिष्ठ साहित्यकार शिवमंगल सिद्धान्तकर जी को कुछ जरूरी कारणों के चलते बीच कार्यक्रम में जाना पड़ा, पर उन्होंने भी सभी उपस्तिथ कवियों विशेषकर सजीव को अपनी शुभकानाएं अवश्य दी. फिलहाल हम आपको छोड़ते हैं कार्यक्रम के अंतिम संबोधन के साथ जहाँ ब्रिजेन्द्र जी और दिनेश जी ने इस यादगार शाम को कुछ इस तरह परिभाषित किया. 


मिथलेश जी, सजीव और उनके युग्मि मित्रों के साथ

कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें
     

दिल्ली पोयट्री में "एक पल की उम्र लेकर"

२४ जून की शाम सजीव सारथी को दिल्ली के अमेरिकन सेंटर, में दिल्ली पोयट्री के कार्यक्रम में बतौर फीचर्ड कवि आमंत्रित किया गया. दिल्ली पोयट्री, दिल्ली के सम्मानित कविता समूह में से एक है, जो दिल्ली के सभी स्थानों पर माह में ३० दिन कविता की महफ़िल रोशन करने का एक बड़ा सपना लेकर पिछले ४ सालों से काम कर रही है. इसके संचालक हैं अमिता दहिया "बादशाह" जो खुद भी एक जाने माने कवि हैं.



कार्यक्रम में हिंदी और अंग्रेजी के कई युवा और वरिष्ठ कवियों ने कविता पाठ किया. सजीव की कवितायें "दीवारें", "ऐसी कोई कविता", और "विलुप्त होते किसान" बेहद पसंद किये गए. कार्यक्रम का कुशल संचालन खुद अमित जी ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में किया. दिल्ली पोयट्री ने सजीव की पुस्तक "एक पल की उम्र लेकर" को बिक्री के लिए भी अपने काउंटर पर जगह दी.

गौर तलब है कि सजीव ने अपना पहला मंचीय कविता पाठ दिल्ली पोयट्री के ही एक कार्यक्रम में किया था करीब चार साल पहले. और आज यहाँ अपनी पुस्तक के साथ उपस्तिथ होना सजीव के लिए एक वृत्त का घूमकर वापस अपनी जगह पर आने जैसा है. दिल्ली पोयट्री के चुने हुए १०० कवियों में से भी सजीव एक थे. हम उम्मीद करेंगें कि दिल्ली पोयट्री अपने शुभ उद्देश्यों में और कामियाब हो ताकि हमें सजीव जैसे और भी प्रतिभाशाली कवि मिल सकें.  

Monday, June 27, 2011

पुराने ज़ख्म खुल गए - रवि मिश्रा

आपकी 'एक पल की उम्र लेकर' पढ़ी और आपसे ईर्ष्या हो रही है. यक़ीन जानिए इस जलन में भी तारीफ़ है, मुहब्बत है. एक अहिन्दी प्रदेश का वासी न सिर्फ हिंदी जानता है, बल्कि हिंदी जीता है. ये मामला हिंदी प्रदेश के वासियों के लिए भूखमरी सरीखा है. जहाँ हिंदी सरकारी गोदामों में अनाज की तरह भरी पड़ी है, लेकिन फिर भी भूखमरी है.
खैर.....आपकी हर रचना अपने आप में बिलकुल ताज़ी है. मैं काफ़िये का हिमायती हूँ. मुझे लगता है की काफ़िये के दायरे में रहकर कोई बड़ी बात कहना बड़ी बात है. लेकिन मुझे ये भी पता है की काफ़िये के परे भी कवितायेँ हैं, शायरी है. बल्कि ये बेहद वृहद् और जटिल भी है. काफ़िया मिलाने में कम से कम इस बात की गुंजाईश तो रहती है कि सामईन 'अच्छी कोशिश कहकर आपको मुआफ़ कर दें. लेकिन बगैर काफ़िये में इस बात का डर हमेशा बना रहता है कि 'ये क्या है' के पत्थर बरस सकते हैं. लेकिन आपकी कलम कमाल है. बागी काफ़िये के भी तरन्नुम कि लज़्ज़त है. विषय बेहद जाने - पहचाने...फिर भी अजनबी से.

अच्छा लगा. पुराने ज़ख्म खुल गए.

आपकी कवितायों से साफ़ हो जाता है कि आप केरल के हैं. हर दूसरे - तीसरे पृष्ठ पर उसकी हरियाली दिखती है. एक बुरी आदत है आपकी कवितायों में. गाहे - बगाहे माज़ी में ले जाते हैं. टीस सी उठती है. आह सी निकलती है. कहीं कुछ फिर से बिखर जाता है. वक़्त महबूबा सी जो होती है. एकबार रूठकर चली जाये तो लौटकर नहीं आती. बस उसकी याद आती है. आपकी कवितायेँ उसी सफ़र पर ले जाती हैं.
मुझे आप शायर कम फोटोग्राफर ज्यादा लगे, जो लफ़्ज़ों से फोटोग्राफी करता है. आपका हर फोटो अपने आप में तारीख़ है. मुझे यक़ीन है कि आज से दसेक साल बाद जब नयी पीढ़ी पुराने समाज कि तलाश करेगी, तो आपकी कवितायेँ इसे मरे, भूले - बिसराए समाज का पता बतायेंगी. जहाँ हाथ में छड़ी थामे मास्टरजी होंगे. मस्ती में झूमते बच्चे होंगे. उनके बसते होने और उनमे भी तमाम दुनिया होगी. लेकिन उतनी भरी नहीं, जितनी कि तब होगी. हम जैसों को भी अपने माज़ी में लौटने का शार्टकट मिलता रहेगा.

शुक्रिया हमारे दिल की बात कहने के लिए.

इति

रवि
फिल्मकार और कवि

Tuesday, June 21, 2011

Rishi S Commented

A wonderful collection of poems which reflect Sajeev's care for relationships, passion for the country and concern for society.I am privileged to have had the opportunity to tune some of these poems.

Rishi S,
Composer, Hyderabad

Wednesday, June 15, 2011

कवियित्री रश्मि प्रभा लिखती हैं


सजीव सारथी ... इनकी पुस्तक की समीक्षा से पहले मैं इनकी खासियत बताना चाहूँगी . सजीव सारथी यानि एक जिंदा सारथी उनका स्वत्व है, उनकी दृढ़ता है, उनका मनोबल है,उनकी अपराजित जिजीविषा है .... हार मान लेना इनकी नियति नहीं , इनसे मिलना , इन्हें पढ़ना , इनके गीतों को सुनना जीवन से मिलना है . हिंद युग्म के आवाज़ http://podcast.hindyugm.com/ से मैंने इनको जाना , पहली बार देखा प्रगति मैदान में हिन्दयुग्म के समारोह में .... कुछ भावनाओं को शब्द दे पाना मुमकिन नहीं होता , फिर भी प्रयास करते हैं हम और .... लोग कहते हैं जताना नहीं चाहिए , पर जताए बिना हम आगे कैसे बढ़ सकते ये कहकर कि इस अनकही पहेली को सुलझाओ ....मैं भी नहीं बढ़ सकती, यूँ कहें बढ़ना नहीं चाहती . अपने 'आज' से संभवतः सजीव जी को कहीं शिकायत होगी, पर मेरे लिए वह कई निराशा के प्रेरणास्रोत हैं और उनकी इसी प्रेरणा के ये स्वर हैं


और है उनका यह संग्रह 'एक पल की उम्र लेकर' !
अपनी पहली रचना 'सूरज' में कवि सूरज से एहसास हाथ में लेकर भी सूरज को मीलों दूर पाता है और इस रचना में मैंने सूरज को कवच की तरह पाया ... जो कवि से कवि के शब्द कहता है -

"मैं छूना चाहता हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहता हूँ
पर ....
तुम कहीं दूर बैठे हो"


कवि सूरज को सुनता है (मेरी दृष्टि , मेरी सोच में) और भ्रमित कहता है-

'तुम कहते तो हो ज़रूर
पर आवाजों को निगल जाती हैं दीवारें ...'
फिर अपनी कल्पना को देखता वह कहता है -
'याद होगी तुम्हें भी
मेरे घर की वो बैठक
जहाँ भूल जाते थे तुम
कलम अपनी ...'


दूसरों की तकलीफों को गहरे तक समझता है कवि, तभी तो चाहता है ...

"काश !..........
मैं कोई ऐसी कविता लिख पाता
कि पढनेवाला पेट की भूख भूल जाता

...
पढनेवाला अपनी थकान को
खूंटी पर उतार टाँगता
....
देख पाता अक्स उसमें
और टूटे ख़्वाबों की किरचों को जोड़ पाता
...काश !'


समसामयिक विषय पर भी कवि ने ध्यान आकर्षित किया है और करवाया है -

'गाँव अब नहीं रहे
प्रेमचंद की कहानियोंवाले
...........
सभ्यता के विकास में अक्सर
विलुप्त हो जाती हैं
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ
.........
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते
जुम्मन और होरी आज
विलुप्त हो रहा है किसान !'


प्रतिस्पर्द्धा, सबकुछ पा लेने की जी तोड़ दौड़, हर फ्रेम को अपना बना लेने की मानसिकता ने बच्चों से पारले की मिठास छीन ली है
तभी तो -

'स्कूल से लौटते बच्चे
काँधों पर लादे
ईसा का सलीब '
.... से दिखाई देते हैं !

और ऐसे में ही अपने बचपन की उतारी केंचुली हमें मनमोहक नज़र आने लगती है. और अनमना मन
कहता है -

'ऐसा स्पर्श दे दो मुझे
संवेदना की आखिरी परत तक
जिसकी पहुँच हो ...'


अन्यथा ईश्वर प्रदत्त कस्तूरी से अनजान मनुष्य कामयाबी की गुफा में अदृश्य होने लगता है , जिसे कवि की ये पंक्तियाँ और स्पष्ट करती हैं -

'कामयाबी एक ऐसा चन्दन है
जिससे लिपट कर हँसता है
नाग - अहंकार का'


ज़िन्दगी जाने कितने रास्तों से गुजरती है , पर सबसे नाज़ुक रास्ता प्यार का लचीली पगडंडियों सा होता है ... हर शाम देता है दस्तक, कभी हंसकर ,
कभी नम होकर और इस डर से कि,

'जाने कब वो लौट जाए ...
समेट लेता हूँ
अश्कों के मोती
और सहेज के रख लेता हूँ ....'


प्यार, त्याग, स्पर्श, ख्याल, मासूमियत, ताजगी सबकुछ है इस 'एक पल की उम्र लेकर ' में . बस एक पन्ना पलटिये और शुरू से अंत तक का सफ़र तय कर लीजिये. फिर - बताइए ज़रूर , क्या इन पलों की सौगात अनमोल नहीं !!!