मुझे आपकी कविता बहुत अच्छी लगी,क्योकि वो हैं ही अच्छी।
मुझे जो अच्छा लगा वो है आपकी भाषा-सहजता और वो बिंब जो हमारे आस-पास
हमेशा मौजूद हैं पर हम उन्हे छोड़ 'कुछ और' के चक्कर में आगे बढ़ जाते
हैं।
मनीष वन्देमातरम
कवि, उत्तर प्रदेश
Monday, August 8, 2011
Thursday, August 4, 2011
दरअसल हम मिले ही नहीं थे अब तक...कविता "मिलन" संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" से
अंतरजाल पर सबसे प्रसिद्ध श्रृंखलाओं में से एक "ओल्ड इस गोल्ड" के स्तंभकार सुजोय चट्टर्जी ने अपनी नयी श्रृंखला कविता संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" को समर्पित किया है. जिसमें संग्रह से उन्होंने १० अपनी पसंदीदा कवितायेँ चुनी हैं जिनपर आधारित १० फ़िल्मी गीतों को भी उनके भाव से जोड़ा है. -------------------------------------------------------------------------
Episode 05
'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! सजीव सारथी की लिखी कविताओं की किताब 'एक पल की उम्र लेकर' से चुनी हुई १० कविताओं पर आधारित शृंखला की आज चौथी कड़ी में हमनें जिस कविता को चुना है, उसका शीर्षक है 'मिलन'।
हम मिलते रहे
रोज़ मिलते रहे
तुमने अपने चेहरे के दाग
पर्दों में छुपा रखे थे
मैंने भी सब ज़ख्म अपने
बड़ी सफ़ाई से ढाँप रखे थे
मगर हम मिलते रहे -
रोज़ नए चेहरे लेकर
रोज़ नए जिस्म लेकर
आज, तुम्हारे चेहरे पर पर्दा नहीं
आज, हम और तुम हैं, जैसे दो अजनबी
दरअसल
हम मिले ही नहीं थे अब तक
देखा ही नहीं था कभी
एक-दूसरे का सच
आज मगर कितना सुन्दर है - मिलन
आज, जब मैंने चूम लिए हैं
तुम्हारे चेहरे के दाग
और तुमने भी तो रख दी है
मेरे ज़ख्मों पर -
अपने होठों की मरहम।
मिलन की परिभाषा कई तरह की हो सकती है। कभी कभी हज़ारों मील दूर रहकर भी दो दिल आपस में ऐसे जुड़े होते हैं कि शारीरिक दूरी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। और कभी कभी ऐसा भी होता है कि वर्षों तक साथ रहते हुए भी दो शख्स एक दूजे के लिए अजनबी ही रह जाते हैं। और कभी कभी मिलन की आस लिए दो दिल सालों तक तरसते हैं और फिर जब मिलन की घड़ी आती है तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे दो नदियाँ अलग अलग तन्हा बहते बहते आख़िरकार संगम में एक दूसरे से मिल गई हों। मिलन और जुदाई सिक्के के दो पहलु समान हैं। दुख और सुख, धूप और छाँव, ख़ुशी और ग़म जैसे जीवन की सच्चाइयाँ हैं, वैसे ही मिलन और जुदाई, दोनों की ही बारी आती है ज़िंदगी में समय समय पर, जिसके लिए आदमी को हमेशा तैयार रहना चाहिए। इसे तो इत्तेफ़ाक़ की ही बात कहेंगे न, जैसा कि गीतकार आनंद बक्शी नें फ़िल्म 'आमने-सामने' के गीत में कहा था कि "कभी रात दिन हम दूर थे, दिन रात का अब साथ है, वो भी इत्तेफ़ाक़ की बात थी, ये भी इत्तेफ़ाक़ की बात है"। बड़ा ही ख़ूबसूरत युगल गीत है लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी नें भी कितना सुरीला कम्पोज़िशन तैयार किया है इस गीत के लिए। तो लीजिए आज मिलन के रंग में रंगे इस अंक में सुनिये 'आमने-सामने' फ़िल्म का यह सदाबहार गीत।
Episode 05
'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! सजीव सारथी की लिखी कविताओं की किताब 'एक पल की उम्र लेकर' से चुनी हुई १० कविताओं पर आधारित शृंखला की आज चौथी कड़ी में हमनें जिस कविता को चुना है, उसका शीर्षक है 'मिलन'।
हम मिलते रहे
रोज़ मिलते रहे
तुमने अपने चेहरे के दाग
पर्दों में छुपा रखे थे
मैंने भी सब ज़ख्म अपने
बड़ी सफ़ाई से ढाँप रखे थे
मगर हम मिलते रहे -
रोज़ नए चेहरे लेकर
रोज़ नए जिस्म लेकर
आज, तुम्हारे चेहरे पर पर्दा नहीं
आज, हम और तुम हैं, जैसे दो अजनबी
दरअसल
हम मिले ही नहीं थे अब तक
देखा ही नहीं था कभी
एक-दूसरे का सच
आज मगर कितना सुन्दर है - मिलन
आज, जब मैंने चूम लिए हैं
तुम्हारे चेहरे के दाग
और तुमने भी तो रख दी है
मेरे ज़ख्मों पर -
अपने होठों की मरहम।
मिलन की परिभाषा कई तरह की हो सकती है। कभी कभी हज़ारों मील दूर रहकर भी दो दिल आपस में ऐसे जुड़े होते हैं कि शारीरिक दूरी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। और कभी कभी ऐसा भी होता है कि वर्षों तक साथ रहते हुए भी दो शख्स एक दूजे के लिए अजनबी ही रह जाते हैं। और कभी कभी मिलन की आस लिए दो दिल सालों तक तरसते हैं और फिर जब मिलन की घड़ी आती है तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे दो नदियाँ अलग अलग तन्हा बहते बहते आख़िरकार संगम में एक दूसरे से मिल गई हों। मिलन और जुदाई सिक्के के दो पहलु समान हैं। दुख और सुख, धूप और छाँव, ख़ुशी और ग़म जैसे जीवन की सच्चाइयाँ हैं, वैसे ही मिलन और जुदाई, दोनों की ही बारी आती है ज़िंदगी में समय समय पर, जिसके लिए आदमी को हमेशा तैयार रहना चाहिए। इसे तो इत्तेफ़ाक़ की ही बात कहेंगे न, जैसा कि गीतकार आनंद बक्शी नें फ़िल्म 'आमने-सामने' के गीत में कहा था कि "कभी रात दिन हम दूर थे, दिन रात का अब साथ है, वो भी इत्तेफ़ाक़ की बात थी, ये भी इत्तेफ़ाक़ की बात है"। बड़ा ही ख़ूबसूरत युगल गीत है लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी नें भी कितना सुरीला कम्पोज़िशन तैयार किया है इस गीत के लिए। तो लीजिए आज मिलन के रंग में रंगे इस अंक में सुनिये 'आमने-सामने' फ़िल्म का यह सदाबहार गीत।
मैं डरा डरा रहता हूँ अचानक पैरों से लिपटने वाली बेलों से...कविता "जंगल" संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" से
अंतरजाल पर सबसे प्रसिद्ध श्रृंखलाओं में से एक "ओल्ड इस गोल्ड" के स्तंभकार सुजोय चट्टर्जी ने अपनी नयी श्रृंखला कविता संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" को समर्पित किया है. जिसमें संग्रह से उन्होंने १० अपनी पसंदीदा कवितायेँ चुनी हैं जिनपर आधारित १० फ़िल्मी गीतों को भी उनके भाव से जोड़ा है. -------------------------------------------------------------------------
Episode 04
ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और शाम लेकर मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हूँ। जैसा कि आप जानते हैं इन दिनों इस स्तंभ में जारी है लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर', जिसके अन्तर्गत सजीव जी की लिखी कविताओं की इसी शीर्षक से किताब में से चुनकर १० कविताओं पर आधारित फ़िल्मी गीत बजाये जा रहे हैं। आज की कविता का शीर्षक है 'जंगल'।
यह जंगल मेरा है
मगर मैं ख़ुद इसके
हर चप्पे से नहीं हूँ वाकिफ़
कई अंधेरे घने कोने हैं
जो कभी नहीं देखे
मैं डरा डरा रहता हूँ
अचानक पैरों से लिपटने वाली बेलों से
गहरे दलदलों से
मुझे डर लगता है
बर्बर और ज़हरीले जानवरों से
जो मेरे भोले और कमज़ोर जानवरों को
निगल जाते हैं
मैं तलाश में भटकता हूँ,
इस जंगल के बाहर फैली शुआओं की,
मुझे यकीं है कि एक दिन
ये सारे बादल छँट जायेंगे
मेरे सूरज की किरण
मेरे जंगल में उतरेगी
और मैं उसकी रोशनी में
चप्पे-चप्पे की महक ले लूंगा
फिर मुझे दलदलों से
पैरों से लिपटी बेलों से
डर नहीं लगेगा
उस दिन -
ये जंगल सचमुच में मेरा होगा
मेरा अपना।
जंगल की आढ़ लेकर कवि नें कितनी सुंदरता से वास्तविक जीवन और दुनिया का चित्रण किया है इस कविता में। हम अपने जीवन में कितने ही लोगों के संस्पर्श में आते हैं, जिन्हें हम अपना कहते हैं, पर समय समय पर पता चलता है कि जिन्हें हम अपना समझ रहे थे, वो न जाने क्यों अब ग़ैर लगने लगे हैं। हमारे अच्छे समय में रिश्तेदार, सगे संबंधी और मित्र मंडली हमारे आसपास होते हैं, पर बुरे वक़्त में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो हमारे साथ खड़े पाये जाते हैं। किसी नें ठीक ही कहा है कि बुरे वक़्त में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है। जीवन की अँधेरी गलियों से गुज़रते हुए अहसास नहीं होता कि कितनी गंदगी आसपास फैली है, पर जब उन पर रोशनी पड़ती है तो सही-ग़लत का अंदाज़ा होता है। कई बार दिल भी टूट जाता है, पर सच तो सच है, कड़वा ही सही। और इस सच्चाई को जितनी जल्दी हम स्वीकार कर लें, हमारे लिए बेहतर है। पर टूटा दिल तो यही कहता है न कि कोई तो होता जिसे हम अपना कह लेते, चाहे वो दूर ही होता, पर होता तो कोई अपना! गुलज़ार साहब नें इस भाव पर फ़िल्म 'मेरे अपने' में एक यादगार गीत लिखा था। आज गायक किशोर कुमार का जन्मदिवस है। उन्हें याद करते हुए उन्ही का गाया यह गीत सुनते हैं जिसकी धुन बनाई है सलिल चौधरी नें।
Episode 04
ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और शाम लेकर मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हूँ। जैसा कि आप जानते हैं इन दिनों इस स्तंभ में जारी है लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर', जिसके अन्तर्गत सजीव जी की लिखी कविताओं की इसी शीर्षक से किताब में से चुनकर १० कविताओं पर आधारित फ़िल्मी गीत बजाये जा रहे हैं। आज की कविता का शीर्षक है 'जंगल'।
यह जंगल मेरा है
मगर मैं ख़ुद इसके
हर चप्पे से नहीं हूँ वाकिफ़
कई अंधेरे घने कोने हैं
जो कभी नहीं देखे
मैं डरा डरा रहता हूँ
अचानक पैरों से लिपटने वाली बेलों से
गहरे दलदलों से
मुझे डर लगता है
बर्बर और ज़हरीले जानवरों से
जो मेरे भोले और कमज़ोर जानवरों को
निगल जाते हैं
मैं तलाश में भटकता हूँ,
इस जंगल के बाहर फैली शुआओं की,
मुझे यकीं है कि एक दिन
ये सारे बादल छँट जायेंगे
मेरे सूरज की किरण
मेरे जंगल में उतरेगी
और मैं उसकी रोशनी में
चप्पे-चप्पे की महक ले लूंगा
फिर मुझे दलदलों से
पैरों से लिपटी बेलों से
डर नहीं लगेगा
उस दिन -
ये जंगल सचमुच में मेरा होगा
मेरा अपना।
जंगल की आढ़ लेकर कवि नें कितनी सुंदरता से वास्तविक जीवन और दुनिया का चित्रण किया है इस कविता में। हम अपने जीवन में कितने ही लोगों के संस्पर्श में आते हैं, जिन्हें हम अपना कहते हैं, पर समय समय पर पता चलता है कि जिन्हें हम अपना समझ रहे थे, वो न जाने क्यों अब ग़ैर लगने लगे हैं। हमारे अच्छे समय में रिश्तेदार, सगे संबंधी और मित्र मंडली हमारे आसपास होते हैं, पर बुरे वक़्त में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो हमारे साथ खड़े पाये जाते हैं। किसी नें ठीक ही कहा है कि बुरे वक़्त में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है। जीवन की अँधेरी गलियों से गुज़रते हुए अहसास नहीं होता कि कितनी गंदगी आसपास फैली है, पर जब उन पर रोशनी पड़ती है तो सही-ग़लत का अंदाज़ा होता है। कई बार दिल भी टूट जाता है, पर सच तो सच है, कड़वा ही सही। और इस सच्चाई को जितनी जल्दी हम स्वीकार कर लें, हमारे लिए बेहतर है। पर टूटा दिल तो यही कहता है न कि कोई तो होता जिसे हम अपना कह लेते, चाहे वो दूर ही होता, पर होता तो कोई अपना! गुलज़ार साहब नें इस भाव पर फ़िल्म 'मेरे अपने' में एक यादगार गीत लिखा था। आज गायक किशोर कुमार का जन्मदिवस है। उन्हें याद करते हुए उन्ही का गाया यह गीत सुनते हैं जिसकी धुन बनाई है सलिल चौधरी नें।
खींच कर कुछ पल को इन मरी हुई सांसों से ज़िंदा कर लूंगा फिर, ज़िंदगी को मैं...कविता "अवकाश" संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" से
अंतरजाल पर सबसे प्रसिद्ध श्रृंखलाओं में से एक "ओल्ड इस गोल्ड" के स्तंभकार सुजोय चट्टर्जी ने अपनी नयी श्रृंखला कविता संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" को समर्पित किया है. जिसमें संग्रह से उन्होंने १० अपनी पसंदीदा कवितायेँ चुनी हैं जिनपर आधारित १० फ़िल्मी गीतों को भी उनके भाव से जोड़ा है. -------------------------------------------------------------------------
Episode 03
'एक पल की उम्र लेकर' - सजीव सारथी की कविताओं से सजी इस पुस्तक में से १० चुनिंदा कविताओं पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की तीसरी कड़ी में प्रस्तुत है कविता 'अवकाश'।
सुबह की गलियों में
अंधेरा है बहुत
अभी आँखों को मूँदे रहो
घड़ी का अलार्म जगाये अगर
रख उसके होठों पे हाथ
चुप करा दो
काला सूरज
आसमान पर लटक तो गया होगा
बाहर शोर सुनता हूँ मैं
इंसानों का, मशीनों का,
आज खिड़की के परदे मत हटाओ
आज पड़े रहने दो, दरवाज़े पर ही,
बासी ख़बरों से सने अख़बार को
किसे चाहिए ये सुबह, ये सूरज
फिर वही धूप, वही साये
वही भीड़, वही चेहरे
वही सफ़र, वही मंज़िल
वही इश्तेहारों से भरा ये शहर
वही अंधी दौड़ लगाती
फिर भी थमी-ठहरी सी
रोज़मर्रा की ये ज़िंदगी
नहीं, आज नहीं
आज इसी कमरे में
पड़े रहने दो मुझे
अपनी ही बाहों में
'हम' अतीत की गलियों में घूमेंगे
गुज़रे बीते मौसमों का सुराग ढूंढ़ेंगे
कुछ रूठे-रूठे
उजड़े-बिछड़े
सपनों को भी बुलवा लेंगे
मुझे यकीन है
कुछ तो ज़िंदा होंगे ज़रूर
खींच कर कुछ पल को इन मरी हुई सांसों से
ज़िंदा कर लूंगा फिर, ज़िंदगी को मैं।
इस कविता में कवि नें जिस अवकाश की कल्पना की है, वह मेरा ख़याल है कि हर आम आदमी करता होगा। आज की भाग-दौड़ भरी और तनावपूर्ण ज़िंदगी में कभी किसी दिन मन में ख़याल आता है कि काश आज छुट्टी मिल जाती उस गतानुगतिक ज़िंदगी से। तो फिर ख़यालों में ही सही, घूम तो आते यादों की गलियारों से; जिन गलियारों से होते हुए जाती है सड़क बर्फ़ से ढके पहाड़ों की तरफ़, वो पहाड़ें जिनमें गूंजती हुई ख़ामोशी की कल्पना कभी गुलज़ार साहब नें की थी 'मौसम' का वह सदाबहार गीत लिखते हुए। ग़ालिब के शेर "दिल ढूंढ़ता है फिर वो ही फ़ुरसत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुरे जाना किए हुए" को आगे बढ़ाते हुए गुलज़ार साहब नें बड़ी ख़ूबसूरती के साथ कभी जाड़ों की नर्म धूप को आंगन में बैठ कर सेंकना, कभी गरमी की रातों में छत पर लेटे हुए तारों को देखना, और कभी बर्फ़ीली वादियों में दिन गुज़ारना, इस तरह के अवकाश के दिनों का बड़ा ही सजीव चित्रण किया था। एक तरफ़ गुलज़ार साहब के ये सजीव ख़यालात और दूसरी तरफ़ सजीव जी के आम जीवन का बड़ा ही वास्तविक वर्णन, दोनों ही लाजवाब, दोनों ही अपने आप में बेहतरीन। आइए इस अवकाश की घड़ी में फ़िल्म 'मौसम' के इस गीत को सुनें। मदन मोहन का संगीत है। इस गीत के दो संस्करणों में लता-भूपेन्द्र का गाया युगल-संस्करण हमनें 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में सुनवाया था, आइए आज सुना जाये भूपेन्द्र का एकल संस्करण।
Episode 03
'एक पल की उम्र लेकर' - सजीव सारथी की कविताओं से सजी इस पुस्तक में से १० चुनिंदा कविताओं पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की तीसरी कड़ी में प्रस्तुत है कविता 'अवकाश'।
सुबह की गलियों में
अंधेरा है बहुत
अभी आँखों को मूँदे रहो
घड़ी का अलार्म जगाये अगर
रख उसके होठों पे हाथ
चुप करा दो
काला सूरज
आसमान पर लटक तो गया होगा
बाहर शोर सुनता हूँ मैं
इंसानों का, मशीनों का,
आज खिड़की के परदे मत हटाओ
आज पड़े रहने दो, दरवाज़े पर ही,
बासी ख़बरों से सने अख़बार को
किसे चाहिए ये सुबह, ये सूरज
फिर वही धूप, वही साये
वही भीड़, वही चेहरे
वही सफ़र, वही मंज़िल
वही इश्तेहारों से भरा ये शहर
वही अंधी दौड़ लगाती
फिर भी थमी-ठहरी सी
रोज़मर्रा की ये ज़िंदगी
नहीं, आज नहीं
आज इसी कमरे में
पड़े रहने दो मुझे
अपनी ही बाहों में
'हम' अतीत की गलियों में घूमेंगे
गुज़रे बीते मौसमों का सुराग ढूंढ़ेंगे
कुछ रूठे-रूठे
उजड़े-बिछड़े
सपनों को भी बुलवा लेंगे
मुझे यकीन है
कुछ तो ज़िंदा होंगे ज़रूर
खींच कर कुछ पल को इन मरी हुई सांसों से
ज़िंदा कर लूंगा फिर, ज़िंदगी को मैं।
इस कविता में कवि नें जिस अवकाश की कल्पना की है, वह मेरा ख़याल है कि हर आम आदमी करता होगा। आज की भाग-दौड़ भरी और तनावपूर्ण ज़िंदगी में कभी किसी दिन मन में ख़याल आता है कि काश आज छुट्टी मिल जाती उस गतानुगतिक ज़िंदगी से। तो फिर ख़यालों में ही सही, घूम तो आते यादों की गलियारों से; जिन गलियारों से होते हुए जाती है सड़क बर्फ़ से ढके पहाड़ों की तरफ़, वो पहाड़ें जिनमें गूंजती हुई ख़ामोशी की कल्पना कभी गुलज़ार साहब नें की थी 'मौसम' का वह सदाबहार गीत लिखते हुए। ग़ालिब के शेर "दिल ढूंढ़ता है फिर वो ही फ़ुरसत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुरे जाना किए हुए" को आगे बढ़ाते हुए गुलज़ार साहब नें बड़ी ख़ूबसूरती के साथ कभी जाड़ों की नर्म धूप को आंगन में बैठ कर सेंकना, कभी गरमी की रातों में छत पर लेटे हुए तारों को देखना, और कभी बर्फ़ीली वादियों में दिन गुज़ारना, इस तरह के अवकाश के दिनों का बड़ा ही सजीव चित्रण किया था। एक तरफ़ गुलज़ार साहब के ये सजीव ख़यालात और दूसरी तरफ़ सजीव जी के आम जीवन का बड़ा ही वास्तविक वर्णन, दोनों ही लाजवाब, दोनों ही अपने आप में बेहतरीन। आइए इस अवकाश की घड़ी में फ़िल्म 'मौसम' के इस गीत को सुनें। मदन मोहन का संगीत है। इस गीत के दो संस्करणों में लता-भूपेन्द्र का गाया युगल-संस्करण हमनें 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में सुनवाया था, आइए आज सुना जाये भूपेन्द्र का एकल संस्करण।
Monday, August 1, 2011
दीवारें, जो रोज़ एक नए नाम की खड़ी कर देते हैं 'वो' दरमियाँ हमारे - सजीव सारथी
अंतरजाल पर सबसे प्रसिद्ध श्रृंखलाओं में से एक "ओल्ड इस गोल्ड" के स्तंभकार सुजोय चट्टर्जी ने अपनी नयी श्रृंखला कविता संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" को समर्पित किया है. जिसमें संग्रह से उन्होंने १० अपनी पसंदीदा कवितायेँ चुनी हैं जिनपर आधारित १० फ़िल्मी गीतों को भी उनके भाव से जोड़ा है. -------------------------------------------------------------------------
Episode 02
'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कल से हमने शुरु की है सजीव सारथी की लिखी कविताओं की किताब 'एक पल की उम्र लेकर' से १० चुने हुए कविताओं और उनसे सम्बंधित फ़िल्मी गीतों पर आधारित यह लघु शृंखला। आज इसकी दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है कविता 'दीवारें'।
मैं छूना चाहता हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहता हूँ
तुम्हारा दिल
पर देखना तो दूर
मैं सुन भी नहीं पाता हूँ तुम्हें
तुम कहीं दूर बैठे हो
सरहदों के पार हो जैसे
कुछ कहते तो हो ज़रूर
पर आवाज़ों को निगल जाती हैं दीवारें
जो रोज़ एक नए नाम की
खड़ी कर देते हैं 'वो' दरमियाँ हमारे
तुम्हारे घर की खिड़की से
आसमाँ अब भी वैसा ही दिखता होगा ना
तुम्हारी रसोई से उठती उस महक को
पहचानती है मेरी भूख अब भी,
तुम्हारी छत पर बैठ कर
वो चाँदनी भर-भर पीना प्यालों में
याद होगी तुम्हें भी
मेरे घर की वो बैठक
जहाँ भूल जाते थे तुम
कलम अपनी
तुम्हारे गले से लग कर
रोना चाहता हूँ फिर मैं
और देखना चाहता हूँ फिर
तुम्हें चहकता हुआ
अपनी ख़ुशियों में
तरस गया हूँ सुनने को
तुम्हारे बच्चों की किलकारियाँ
जाने कितनी सदियाँ से
पर सोचता हूँ तो लगता है
जैसे अभी कल की ही तो बात थी
जब हम तुम पड़ोसी हुआ करते थे
और उन दिनों
हमारे घरों के दरमियाँ भी फ़कत
एक ईंट-पत्थर की
महीन-सी दीवार हुआ करती थी... बस।
दीवारें कभी दो परिवारों, दो घरों के बीच दरार पैदा कर देती हैं, तो कभी दो दिलों के बीच। सचमुच बड़ा परेशान करती हैं ये दीवारें, बड़ा सताती हैं। पर ये भी एक हकीकत है कि चाहे दुनिया कितनी भी दीवारें खड़ी कर दें, चाहे कितने भी पहरे बिठा दें, प्यार के रास्ते पर कितने ही पर्वत-सागर बिछा दें, सच्चा प्यार कभी हार स्वीकार नहीं करता। किसी न किसी रूप में प्यार पनपता है, जवान होता है। लेकिन यह तभी संभव है जब कोशिश दोनों तरफ़ से हों। कभी कभार कई कारणों से दोनों में से कोई एक रिश्ते को आगे नहीं बढ़ा पाता। ऐसे में दूसरे के दिल की आह एक सदा बनकर निकलती है। चाहे कोई सुने न सुने, पर दिल तो पुकारे ही चला जाता है। कई बार राह पर फूल बिछे होने के बावजूद किसी मजबूरी की वजह से कांटे चुनने पड़ते हैं। इससे रिश्ते में ग़लतफ़हमी जन्म लेती है और एक बार शक़ या ग़लतफ़हमी जन्म ले ले तो उससे बचना बहुत मुश्किल हो जाता है। अनिल धवन और रेहाना सुल्तान अभिनीत १९७० की फ़िल्म 'चेतना' में सपन जगमोहन के संगीत में गीतकार नक्श ल्यालपुरी नें भी एक ऐसा ही गीत लिखा था "मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा, मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को तू सुने न सुने"। सजीव जी की कविता 'दीवारें' को पढ़कर सब से पहले इसी गीत की याद आई थी, तो लीजिए इस ख़ूबसूरत कविता के साथ इस ख़ूबसूरत गीत का भी आनन्द लें।
Episode 02
'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कल से हमने शुरु की है सजीव सारथी की लिखी कविताओं की किताब 'एक पल की उम्र लेकर' से १० चुने हुए कविताओं और उनसे सम्बंधित फ़िल्मी गीतों पर आधारित यह लघु शृंखला। आज इसकी दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है कविता 'दीवारें'।
मैं छूना चाहता हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहता हूँ
तुम्हारा दिल
पर देखना तो दूर
मैं सुन भी नहीं पाता हूँ तुम्हें
तुम कहीं दूर बैठे हो
सरहदों के पार हो जैसे
कुछ कहते तो हो ज़रूर
पर आवाज़ों को निगल जाती हैं दीवारें
जो रोज़ एक नए नाम की
खड़ी कर देते हैं 'वो' दरमियाँ हमारे
तुम्हारे घर की खिड़की से
आसमाँ अब भी वैसा ही दिखता होगा ना
तुम्हारी रसोई से उठती उस महक को
पहचानती है मेरी भूख अब भी,
तुम्हारी छत पर बैठ कर
वो चाँदनी भर-भर पीना प्यालों में
याद होगी तुम्हें भी
मेरे घर की वो बैठक
जहाँ भूल जाते थे तुम
कलम अपनी
तुम्हारे गले से लग कर
रोना चाहता हूँ फिर मैं
और देखना चाहता हूँ फिर
तुम्हें चहकता हुआ
अपनी ख़ुशियों में
तरस गया हूँ सुनने को
तुम्हारे बच्चों की किलकारियाँ
जाने कितनी सदियाँ से
पर सोचता हूँ तो लगता है
जैसे अभी कल की ही तो बात थी
जब हम तुम पड़ोसी हुआ करते थे
और उन दिनों
हमारे घरों के दरमियाँ भी फ़कत
एक ईंट-पत्थर की
महीन-सी दीवार हुआ करती थी... बस।
दीवारें कभी दो परिवारों, दो घरों के बीच दरार पैदा कर देती हैं, तो कभी दो दिलों के बीच। सचमुच बड़ा परेशान करती हैं ये दीवारें, बड़ा सताती हैं। पर ये भी एक हकीकत है कि चाहे दुनिया कितनी भी दीवारें खड़ी कर दें, चाहे कितने भी पहरे बिठा दें, प्यार के रास्ते पर कितने ही पर्वत-सागर बिछा दें, सच्चा प्यार कभी हार स्वीकार नहीं करता। किसी न किसी रूप में प्यार पनपता है, जवान होता है। लेकिन यह तभी संभव है जब कोशिश दोनों तरफ़ से हों। कभी कभार कई कारणों से दोनों में से कोई एक रिश्ते को आगे नहीं बढ़ा पाता। ऐसे में दूसरे के दिल की आह एक सदा बनकर निकलती है। चाहे कोई सुने न सुने, पर दिल तो पुकारे ही चला जाता है। कई बार राह पर फूल बिछे होने के बावजूद किसी मजबूरी की वजह से कांटे चुनने पड़ते हैं। इससे रिश्ते में ग़लतफ़हमी जन्म लेती है और एक बार शक़ या ग़लतफ़हमी जन्म ले ले तो उससे बचना बहुत मुश्किल हो जाता है। अनिल धवन और रेहाना सुल्तान अभिनीत १९७० की फ़िल्म 'चेतना' में सपन जगमोहन के संगीत में गीतकार नक्श ल्यालपुरी नें भी एक ऐसा ही गीत लिखा था "मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा, मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को तू सुने न सुने"। सजीव जी की कविता 'दीवारें' को पढ़कर सब से पहले इसी गीत की याद आई थी, तो लीजिए इस ख़ूबसूरत कविता के साथ इस ख़ूबसूरत गीत का भी आनन्द लें।
सुजॉय ने चुने "एक पल की उम्र लेकर" से १० अपनी पसंदीदा कवितायेँ - आज की कविता - सरफिरा है वक्त
अंतरजाल पर सबसे प्रसिद्ध श्रृंखलाओं में से एक "ओल्ड इस गोल्ड" के स्तंभकार सुजोय चट्टर्जी ने अपनी नयी श्रृंखला कविता संग्रह "एक पल की उम्र लेकर" को समर्पित किया है. जिसमें संग्रह से उन्होंने १० अपनी पसंदीदा कवितायेँ चुनी हैं जिनपर आधारित १० फ़िल्मी गीतों को भी उनके भाव से जोड़ा है.
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Episode 01
'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आप सभी का इस सुरीले सफ़र में। कृष्णमोहन मिश्र जी द्वारा प्रस्तुत दो बेहद सुंदर शृंखलाओं के बाद मैं, सुजॉय चटर्जी वापस हाज़िर हूँ इस नियमित स्तंभ के साथ। इस स्तंभ की हर लघु शृंखला की तरह आज से शुरु होने वाली शृंखला भी बहुत ख़ास है, और साथ ही अनोखा और ज़रा हटके भी। दोस्तों, आप में से बहुत से श्रोता-पाठकों को मालूम होगा कि 'आवाज़' के मुख्य सम्पादक सजीव सारथी की लिखी कविताओं का पहला संकलन हाल ही में प्रकाशित हुआ है, और इस पुस्तक का शीर्षक है 'एक पल की उम्र लेकर'। जब सजीव जी नें मुझसे अपनी इस पुस्तक के बारे में टिप्पणी चाही, तब मैं ज़रा दुविधा मे पड़ गया क्योंकि कविताओं की समीक्षा करना मेरे बस की बात नहीं। फिर मैंने सोचा कि क्यों न इस पुस्तक में शामिल कुल ११० कविताओं में से दस कविताएँ छाँट कर और उन्हें आधार बनाकर फ़िल्मी गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला पेश करूँ? फ़िल्मी गीत जीवन के किसी भी पहलु से अंजान नहीं रहा है, इसलिए इन १० कविताओं से मिलते जुलते १० गीत चुनना भी बहुत मुश्किल काम नहीं था। तो सजीव जी के मना करने के बावजूद मैं यह क़दम उठा रहा हूँ और उनकी कविताओं पर आधारित प्रस्तुत कर रहा हूँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर'।
'एक पल की उम्र लेकर' शृंखला की पहली कड़ी के लिए इस पुस्तक में प्रकाशित जिस कविता को मैंने चुना है, वह है 'सरफ़िरा है वक़्त'। आइए पहले इस कविता को पढ़ें।
उदासी की नर्म दस्तक
होती है दिल पे हर शाम
और ग़म की गहरी परछाइंयाँ
तन्हाइयों का हाथ थामे
चली आती है
किसी की भीगी याद
आंखों में आती है
अश्कों में बिखर जाती है
दर्द की कलियाँ
समेट लेता हूँ मैं
अश्कों के मोती
सहेज के रख लेता हूँ मैं
जाने कब वो लौट आये
वो ठंडी चुभन
वो भीनी ख़ुशबू
अधखुली धुली पलकों का
नर्म नशीला जादू
तसव्वुर की सुर्ख़ किरणें
चन्द लम्हों को जैसे
डूबते हुए सूरज में समा जाती है
शाम के बुझते दीयों में
एक चमक सी उभर आती है
टूटे हुए लम्हें बटोर लेता हूँ मैं
बुझती हुई चमक बचा लेता हूँ मैं
जाने कब वो लौट आये
सरफिरा है वक़्त
कभी-कभी लौट आता है,
दोहराने अपने आप को।
शाम की उदासी, रात की तन्हाइयाँ, अंधेरों में बहती आँसू की नहरें जिन्हें अंधेरे में कोई दूसरा देख नहीं सकता, बस वो ख़ुद बहा लेता है, दिल का बोझ कम कर लेता है। किसी अपने की याद इस हद तक घायल कर देती है कि जीने की जैसे उम्मीद ही खोने लगती है। और फिर कभी अचानक मन में आशा की कोई किरण भी चमक उठती है कि उसकी याद की तरह शायद कभी वो ही लौट आये, क्योंकि वक़्त तो सरफिरा होता है न? कभी कभी दाम्पत्य जीवन में छोटी-छोटी ग़लतफ़हमिओं और अहम की वजह से पति-पत्नी में भी अनबन हो जाती है, रिश्ते में दरार आती है, और कई बार दोनों अलग भी हो जाते हैं। लेकिन कुछ ही समय में होता है पछतावा, अनुताप। और ऐसे में अपने साथी की यादों के सिवा कुछ नहीं होता करीब। ऐसी ही एक सिचुएशन बनी थी फ़िल्म 'गाइड' में। गीतकार शैलेन्द्र की कलम नें देव आनन्द साहब की मनस्थिति को कुछ इन शब्दों में क़ैद किया था - "दिन ढल जाये हाये रात न जाये, तू तो न आये तेरी याद सताये"। सजीव जी की उपर्योक्त कविता में भी मुझे इसी भाव की छाया मिलती है। तो आइए सुना जाये फ़िल्म 'गाइड' का यह सदाबहार गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में। आज ३१ जुलाई, रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम इस गायकों के शहंशाह को देते हैं ये सुरीली श्रद्धांजली।
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Episode 01
'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आप सभी का इस सुरीले सफ़र में। कृष्णमोहन मिश्र जी द्वारा प्रस्तुत दो बेहद सुंदर शृंखलाओं के बाद मैं, सुजॉय चटर्जी वापस हाज़िर हूँ इस नियमित स्तंभ के साथ। इस स्तंभ की हर लघु शृंखला की तरह आज से शुरु होने वाली शृंखला भी बहुत ख़ास है, और साथ ही अनोखा और ज़रा हटके भी। दोस्तों, आप में से बहुत से श्रोता-पाठकों को मालूम होगा कि 'आवाज़' के मुख्य सम्पादक सजीव सारथी की लिखी कविताओं का पहला संकलन हाल ही में प्रकाशित हुआ है, और इस पुस्तक का शीर्षक है 'एक पल की उम्र लेकर'। जब सजीव जी नें मुझसे अपनी इस पुस्तक के बारे में टिप्पणी चाही, तब मैं ज़रा दुविधा मे पड़ गया क्योंकि कविताओं की समीक्षा करना मेरे बस की बात नहीं। फिर मैंने सोचा कि क्यों न इस पुस्तक में शामिल कुल ११० कविताओं में से दस कविताएँ छाँट कर और उन्हें आधार बनाकर फ़िल्मी गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला पेश करूँ? फ़िल्मी गीत जीवन के किसी भी पहलु से अंजान नहीं रहा है, इसलिए इन १० कविताओं से मिलते जुलते १० गीत चुनना भी बहुत मुश्किल काम नहीं था। तो सजीव जी के मना करने के बावजूद मैं यह क़दम उठा रहा हूँ और उनकी कविताओं पर आधारित प्रस्तुत कर रहा हूँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर'।
'एक पल की उम्र लेकर' शृंखला की पहली कड़ी के लिए इस पुस्तक में प्रकाशित जिस कविता को मैंने चुना है, वह है 'सरफ़िरा है वक़्त'। आइए पहले इस कविता को पढ़ें।
उदासी की नर्म दस्तक
होती है दिल पे हर शाम
और ग़म की गहरी परछाइंयाँ
तन्हाइयों का हाथ थामे
चली आती है
किसी की भीगी याद
आंखों में आती है
अश्कों में बिखर जाती है
दर्द की कलियाँ
समेट लेता हूँ मैं
अश्कों के मोती
सहेज के रख लेता हूँ मैं
जाने कब वो लौट आये
वो ठंडी चुभन
वो भीनी ख़ुशबू
अधखुली धुली पलकों का
नर्म नशीला जादू
तसव्वुर की सुर्ख़ किरणें
चन्द लम्हों को जैसे
डूबते हुए सूरज में समा जाती है
शाम के बुझते दीयों में
एक चमक सी उभर आती है
टूटे हुए लम्हें बटोर लेता हूँ मैं
बुझती हुई चमक बचा लेता हूँ मैं
जाने कब वो लौट आये
सरफिरा है वक़्त
कभी-कभी लौट आता है,
दोहराने अपने आप को।
शाम की उदासी, रात की तन्हाइयाँ, अंधेरों में बहती आँसू की नहरें जिन्हें अंधेरे में कोई दूसरा देख नहीं सकता, बस वो ख़ुद बहा लेता है, दिल का बोझ कम कर लेता है। किसी अपने की याद इस हद तक घायल कर देती है कि जीने की जैसे उम्मीद ही खोने लगती है। और फिर कभी अचानक मन में आशा की कोई किरण भी चमक उठती है कि उसकी याद की तरह शायद कभी वो ही लौट आये, क्योंकि वक़्त तो सरफिरा होता है न? कभी कभी दाम्पत्य जीवन में छोटी-छोटी ग़लतफ़हमिओं और अहम की वजह से पति-पत्नी में भी अनबन हो जाती है, रिश्ते में दरार आती है, और कई बार दोनों अलग भी हो जाते हैं। लेकिन कुछ ही समय में होता है पछतावा, अनुताप। और ऐसे में अपने साथी की यादों के सिवा कुछ नहीं होता करीब। ऐसी ही एक सिचुएशन बनी थी फ़िल्म 'गाइड' में। गीतकार शैलेन्द्र की कलम नें देव आनन्द साहब की मनस्थिति को कुछ इन शब्दों में क़ैद किया था - "दिन ढल जाये हाये रात न जाये, तू तो न आये तेरी याद सताये"। सजीव जी की उपर्योक्त कविता में भी मुझे इसी भाव की छाया मिलती है। तो आइए सुना जाये फ़िल्म 'गाइड' का यह सदाबहार गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में। आज ३१ जुलाई, रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम इस गायकों के शहंशाह को देते हैं ये सुरीली श्रद्धांजली।
सजीव सारथी नें अपने काव्य संग्रह के साथ ही अंतर्जाल की दुनिया के बाहर स्वयं को विस्तारित किया है
“उस “सारथी” के नाम जो इस सजीव शरीर में बसता है।" ‘सजीव सारथी’ नें समर्पण के इसी वाक्यांश में अपने पहले काव्य संग्रह “एक पल की उम्र ले कर” के मर्म को प्रस्तुत किया है। कवितायें पढते हुए बगीचे में खिले नये पुष्प की खुशबू सी आती है, तो बरसाती नदी के प्रवाह से निकलता कल कल स्वर सा भी महसूस होता है। कोई बनावटीपन नहीं, कोई लच्छेदार भाषण-संभाषण नहीं, कहीं कोई ओज-आक्रोश नहीं, कोई धारा-विचारधारा के प्रलाप नहीं अपितु विशुद्ध कवितायें हैं इस संग्रह में। हेवेन्ली बेबी बुक्स, कोच्चि केरला से प्रकाशित संग्रह में प्रस्तुत रचनायें इतनी तराशी हुई हैं कि यकीन करना कठिन है यह किसी ‘अहिन्दी भाषी’ की कवितायें हैं। हर शब्द सटीक और भाव भरा जैसे यह सजीव की अपनी ही भाषा है, हिन्दी-अहिन्दी की दीवार के मायने क्या? अपनी भूमिका में शास्त्री जे सी फिलिप सजीव की कविताओं को सहज कवितायें पारिभाषित करते हैं। वे लिखते हैं कि “अधिकतर कवियों के साथ परेशानी यह है कि उनकी दस रचनायें पढ लीजिये तो उसके बाद की हर रचना पहले जैसी लगती है। लेकिन सजीव की हर रचना अपने आप में नयापन लिये रहती है.. “। वे आगे लिखते हैं - “प्रस्तुत पुस्तक की रचनाओं नें सिर्फ यादों और कुंठाओं को ही नहीं बल्कि मन की मधुर-से-मधुर अभिलाषाओं को एवं दिमाग की कठिन से कठिन (दार्शनिक) कसरतों को भी अपनी पंक्ति में बाँधा है“। उन्होंने पुन: लिखा है - “आज के पाठक को कविता ऎसी चाहिये जो उसे आकर्षित करे, पढते ही अर्थ समझ में आने लगे, और साथ-ही-साथ आँखों से हो कर गुजरते शब्द मन को स्पर्श भी करते जाये”।
सजीव की कविताओं पर इस उद्धरणों से बात आगे बढायी जा सकती है। मैं सजीव की कविताओं पर “नवोदित रचनाकार” की परची नहीं चिपका सकता। कथ्य, शिल्प और दार्शनिक चिंतन कवि को रचना-संसार में कई पायदानों उपर खडा करता है। कविता के शीर्षक छोटे हैं और प्राय: उनमें पूरी रचना का मर्म मिल जाता है। कविता में दार्शनिक तत्वों की अधिकता के कारण कई बार एक कविता पढते हुए अनेक कवितायें पढ जाने का भान होता है। कवितायें हर पठन पर नये स्वरूप और नये ही परिधान में झांकती मुस्कुराती हुई पाठक से स्वयं को एकाधिक बार बढे जाने का आग्रह करती हैं। संग्रह में प्राय: मुक्त कवितायें हैं लेकिन उनमें रसानुभूति है तथा अलंकारिकता है। मैं विषयों की विविधता पर भी अवश्य चर्चा करना चाहूंगा। सजीव नें अपने अंतस को भी विषय बनाया है, अपनी सोच को भी विषय बनाया है, अपने ‘ऑब्जरवेशन’ को भी विषय बनाया है, अपने सामाजिक सरोकारों को भी विषय बनाया है, प्रकृति को भी विषय बनाया है तो अपने सपनों को भी विषय बनाया है।
कवि की रचनाओं में “मैं” तत्व अनेक स्थलों पर प्रस्तुत हुआ है। यह इस लिये कि कवि अपने अनुभवों की व्याख्या अपने बिम्बों के माध्यम से स्वयं ही करना चाहता है। उसे वे प्रतीक सहज लगते हैं जिनमें वह खुद एक पात्र हो कर व्याख्यान दे सके -
चट्टान मेरी तरह खामोश है/ और मैं जड़, उसकी तरह
आज भी वो पेड मेरे सामने है/और मैं देखता हूँ
उसकी नंगी शाखों से परे/ चमकती हुई लाल गेंद
आसमान पर लटकी हुई/ मेरी पहुँच से मीलों दूर।
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सदियों से बह रहा हूँ/ किसी नदी की तरह
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कलम अपनी/ तुम्हारे गले से लग कर
रोना चाहता हूँ फिर मैं/ और देखना चाहता हूँ फिर
तुम्हें चहकता हुआ/ अपनी खुशियों में
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कल मैने दर-बदर देखा था उसके बच्चों को,
पी गयी क्या एक घर और ये शराब शायद।
सजीव सामाजिक सरोकारों से जुड कर लिखते हैं। उनकी कलम विद्रोही तो हर्गिज नहीं है लेकिन चुप रह कर बैठने वाली भी नहीं है। वे शब्द चित्र उपस्थित कर देते हैं जिन्हें पढते ही जैसे कोई पेंटिंग सी आँखों के आगे उपस्थित हो जाती है। एसा शब्द चित्र जो सोचने का धरातल देता है और पाठक पर ही फैसला छोड देता है कि यह आज का सच है और अब तुम जानों कि इसी के साथ जीना चाहते हो या प्रतिकार करना। कवि फैसले सुनाने में यकीन नहीं रखता इसी लिये शब्दचित्र परिणामों तक जा कर मुक्ताकाश हो जाते हैं...गहरी सोच में पाठक को छोड कर ये कवितायें चलती बनती हैं। सजीव नें व्यंग्य को नहीं आजमाया है यद्यपि कई बात कविताओं के अर्थों में यह छुपा-ढका सा मिलेगा। यदि आप तनिक भी संवेदनशील हैं तो मखमल से प्रतीत होने वाले सजीव के शब्द आपको चुभेंगे अवश्य -
एक नन्हीं सी चिंगारी/ कहीं राख में दबी थी
लपक कर उसने/ किरणों को छू लिया/ सूखे पत्तों को आग लगा दी
हवाओं में उडा दिया।
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कुछ धार्मिक हो जाते हैं/ रट लेते हैं वेद पुराण/ कंठस्थ कर लेते हैं
और बन जाते हैं तोते/करते रहते हैं वमन-
कुछ उधर लिये हुए शब्दों का उम्रभर/ और दूकान चलाते हैं
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तुम कौन हो सुनाने वाले/ तनिक उससे भी तो पूछो
कौन अपना है उसका
मेरा लहू गिरा है पसीना बन कर/ उसके दामन में
महक मेरी मिट्टी की/ बखूबी पहचानता है वो।
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धरती का दामन सुर्ख हुआ जाता है
फिर आदम नें खुल्द में/ किसी जुर्म को अंजाम दिया है
इस बार/ खून खुदा का बहा है शायद
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मैं एसी कोई कविता लिख पाता
कि पढने वाला/ पेट की भूख भूल जाता
और प्यासे मन की/ दाह को तृप्त कर पाता
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सभ्यता के विकास में अक्सर
विलुप्त हो जाती हैं/ हाशिये पर पडी प्रजातियाँ
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते/ जुम्मन और होरी आज
मेरे गाँव में/ विलुप्त हो रहा है – किसान।
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अपने अपने सपनों से जागते हैं
आदमी, चिडिया/ खरगोश, भेडिया
और, अपने पेट की अतडियों में/ बजते हुए नगाडे सुनते हैं
और फिर शुरु होती है/ अपनी अपनी भूख से लडते जीवों की/ दिनचर्या
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मुझको ही तो ढाल बना कर आखिर
तलवार चला रहे हो तुम
जन्मों से जी रहा हूँ इस संग्राम को मैं
लहू से अपने भडका रहा हूँ इस आग को मैं
थक चुका हूँ, चूक चुका हूँ/खुद को बहुत फूँक चुका हूँ
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शब्द कुछ/कल शाम निकले थे/बाजार में घूमने
रात शहर में हुए/बम धमाकों में मारे गये
दोस्ती/प्यार/विश्वास/इंसानियत
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खोखली है बुलंदियाँ/ दिखावे की सब रौनक है
ये वो इमारत है/ जिसकी नींव तले/ कई ख्वाब दफन हैं।
मैं इन उद्धरित पंक्तियों के माध्यम से यह वकालत करना चाहता हूँ कि समकालीनता की बहस में भी सजीव की ये कविताए अपना स्थान रखती हैं। आप इन्हें हल्के में नहीं ले सकते या खारिज नहीं कर सकते। सजीव का समाज विषयक अपना दृष्टिकोण है तथा वे बिना बहस में पडे “विचारधाराओं” को भी कटघरे में खडा
करते हैं –
चारो दिशायें मिल जायें तो भी/ दुनियाँ एक हो जाये तो भी
ताकत ही राज करेगा फिर भी
कमजोर दबाये जायेंगे यूँ ही/ शासन यही रहेगा फिर भी
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भूख पेट की सब को नोचती/जिस्म की तडप भी है एक सी
चाह भी वही, आह भी वही/मंजिलें वही, राह भी वही
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क्यों है आखिर/ अपनी ही सत्ता से कटा छटा
क्यों है यूँ/अपने ही वतन में अजनबी-/आम आदमी।
मैं कवि के स्त्रीविमर्श को भी आडंबरविहीन मानता हूँ। उद्धरित कविता असाधारण है जो माँ-बेटी की नोक झोंक पर ही केन्द्रित नहीं है अपितु वह माँ की प्रसव पीडा से ले कर एक बेटी के अपने साथ होने के कोमल असहास की बानगी भी है। हजारो अर्थ हैं इन पंक्तियों के और इस विषय पर हर बहस के केन्द्र में ये पंक्तियाँ स्वत: पायी जाती हैं -
थाली में रखे/ मटर के दाने/ बिखर गये
”हे मरी”/माँ नें एक/ मीठी सी गाली दी
अपनी किस्मत को कोसा/ फिर उठ कर/ बिखरे दाने बीनने लगी।
आज उस बच्ची का जन्मदिन है।
आज वह पूरे नौ साल की हो जायेगी
नौ साल, नौ महीने की।
इसी तरह अपने बेटे को स्कूल छोडने जाता और समझाता कोई मजदूर जब बडी बडी कोठियाँ देखता है तो उसके सपनों के स्वर उँचे हो जाते हैं। लेकिन इतना ही तो नहीं....कविता वर्ग संघर्ष की बात करते हुए बिना जिन्दाबाद और मुर्दाबाद के नारे लगाये धरती और आसमान के क्षितिज बन जाने का ही स्वप्न है -
यूँ भी उसका स्वर तेज है
मगर उसकी आवाज/ उस गली से गुजरते वक्त
और तेज हो जाती है/ जहाँ कोठियाँ हैं
बडे-बडे रईसों की।
कविता लिखी नहीं जाती यह अवतरित होती है। यह जितना सरोकारों को अभिव्यक्त करती है उतना ही आत्ममंथन भी। कविता आग या तपिश ही नहीं होती वह तो सुनहला मोरपंख भी होती है और सुबह की पहली धूप भी होती है। कविता बाँसुरी की धुन भी है और बारिश की रिमझिम भी। यह तो कवि है जब बारिश में जंगल को देखता है तो उसे नाचता मोर दिखता है लेकिन शहर भी तो खूबसूरत है? बारिश उसे भी तो नहला कर तरोताजा कर जाती है? मिट्टी का सोंधापन उसे भी तो महमाता है और कवि कैसे चूक सकता हैं? उसकी कलम सजीव हो उठती है -
सुरमई आकाश बरसता है/ आशीर्वाद की तरह
बूंदों की टप टप स्वरलहरियों से/ एक भीनी भीनी, सौंधी सौंधी
ठंडक सी उतरती है/ बारिश में भीगता है जब ये शहर।
किंतु एसा भी नहीं कि गाँव सजीव को नहीं खींचता या कि बीता हुआ समय उसे शब्दों की चित्रकारी करने को बाध्य नहीं करता। वे बखूबी से लिखते हैं –
कीचड से सने पाँव ले कर
कच्ची पगडंडियों से गुजरते थे
उन कदमों के निशां/ अभी मिटे नहीं हैं
कविता में बिम्ब नये हैं और जीवंत हैं। जैसे चित्रकार नें सही गढा है और सच्चे रंग भरे हैं। बिम्ब अनूठे भी हैं और कई बात चमत्कृत भी कर देते हैं। बिम्ब किसी दूसरी दुनिया से उठा कर नहीं लाये गये हैं वे आस-पास से ही बीने बटोरे गये हैं। कभी बोतल बिम्ब है तो कभी शतरंज तो कभी पीपल तो कभी दर्पण -
मैं देखता हूँ अक्सर/एक छोटी सी बोतल
जिसमें कैद है/ एक देवता और एक शैतान
जो बिना एक हुए/ आ नहीं सकते बोतल के बाहर
एक हो कर दोनों/ कैद से तो छूटते हैं
पर लडकर फिर अलग हो जाते हैं।
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मन की शतरंज/ चौंसठ दोरंगी खानों की बिसात
उसपार सोलहों मोहरे तुम्हारे/ इसपार सोलहों मेरे
तुम आशा के अनुरूप/ अडिग, आश्वस्त और निश्चिंत
मैं बीते अनुभवों से कुछ/ सहमा, डरा, और अव्यवस्थित
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ज़िन्दगी तो थी वहीं/ जिसके सायों को हमनें
डूबते सूरज की आँखों में देखा था
उस बूढे पीपल की/ छाँव में ही सुकून था कहीं
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नींद के टूटे दर्पण से/ कुछ ख्वाब चटख कर
बिखर गये थे कभी/ चुभते हैं अब भी आँखों में
वो काँच के दाने।
सजीव की आत्मचिंतन और आत्ममंथन करती हुई कवितायें कहीं भी कुंठित नहीं है। वह पाठक को घुटाती नहीं है। ये कवितायें आशावादी हैं, उम्मीद से भरी हुई हैं। ये कवितायें आध्यात्म भी हैं और श्रंगार भी। कवितायें हार को अस्वीकार भी हैं तो उम्मीद का अम्बार भी। ये कभी स्वयं प्यास हैं तो कभी प्रश्न। कवितायें कभी सुझाव हैं तो कभी उत्तर भी हैं -
कितने किनारे/ पानी में समा गये
फिर भी प्यासे रहे
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जैसे कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ/ कुछ अनुत्तरित सवालों का
समूहगान जैसे/ कैसी विडम्बना है ये
आखिर हम मुक्त क्यों नहीं हो पाते?
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खोल दो इन दरीचों को/ ताकि एक बार फिर
गुलाबी धूप/छू सके मुझे आ कर
इन सब्ज झरोखों से।
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मगर कुछ बदनसीब/ एसे भी रह जाते हैं
जिनपर कोई रंग नहीं चढ पाता पर भी
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हम अपने बचपन की केंचुली को
धीरे धीरे उतारते हैं।
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एसा स्पर्श दे दो मुझे
जिसकी अनुभूति के लिये/ उम्र भी एक महज हो
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मेरे तलवों तले से निकलता
ये साया/ मेरा है भी या नहीं
या फिर मेरे जैसा कोई और है
जिसने मेरे पैरों में/ सफर बाँध रखा है।
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फिर क्यों, नाखुदा को खुदा कहें
क्यों सहारों को ढूंढते रहें
आओ वक्त के पंखों को परवाज दें
एक नयी उदान दें/ अनजान दिशाओं की ओर।
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तभी कहीं दूर से, एक किरण आई
पलकों पर बिखर गयी/ लगा किसी नें कहा हो-
उजाला हो गया/ अब तो सच को पहचानो।
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एक नासमझ इतरा रहा था
एक पल की उम्र ले कर।
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वो समेट लेता है मेरे सारे आँसू/ अपने दामन में
फिर प्यार से काँधे पर रख कर हाँथ
कहता है – अभी हारना नहीं/अभी हारना नहीं
काव्य संग्रह के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित परिचय कहता है कि सजीव मूलत: एक गीतकार हैं जो कविताओं में अपने आप को तलाश करते रहते हैं। काव्य संग्रह “एक पल की उम्र ले कर” में सजीव का सिर्फ एक गीत और कुछ गज़लें ही उपलब्ध हैं। कुछ उदाहरण इस विधा में उनकी दक्षता की ओर इशारा करते हैं -
देखता है क्यों हैरान हो कर, आईना मुझे रोज,
ढूंढता है, मुखौटों के शहर में एक चेहरा – मुखौटा।
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ख्वाब बोये जो हमने, क्या बुरा किया।
चंद मुरझा गए तो क्या, खिले हैं कुछ।
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पीकर के जहर भी, सूली पर मर कर भी,
जिन्दा है सच यानी, झूठ के भाले कुंद हैं।
सजीव सारथी नें अपने काव्य संग्रह के साथ ही अंतर्जाल की दुनिया के बाहर स्वयं को विस्तारित किया है। उनके आगामी काव्यसंग्रहों की प्रतीक्षा है तथा उन्हें निरंतर सृजन के लिये हार्दिक शुभकामनायें।
Rajeev Ranjan Prasad.
Poet and Writer
Editor - Sahitya Shilpi
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