Monday, June 27, 2011

पुराने ज़ख्म खुल गए - रवि मिश्रा

आपकी 'एक पल की उम्र लेकर' पढ़ी और आपसे ईर्ष्या हो रही है. यक़ीन जानिए इस जलन में भी तारीफ़ है, मुहब्बत है. एक अहिन्दी प्रदेश का वासी न सिर्फ हिंदी जानता है, बल्कि हिंदी जीता है. ये मामला हिंदी प्रदेश के वासियों के लिए भूखमरी सरीखा है. जहाँ हिंदी सरकारी गोदामों में अनाज की तरह भरी पड़ी है, लेकिन फिर भी भूखमरी है.
खैर.....आपकी हर रचना अपने आप में बिलकुल ताज़ी है. मैं काफ़िये का हिमायती हूँ. मुझे लगता है की काफ़िये के दायरे में रहकर कोई बड़ी बात कहना बड़ी बात है. लेकिन मुझे ये भी पता है की काफ़िये के परे भी कवितायेँ हैं, शायरी है. बल्कि ये बेहद वृहद् और जटिल भी है. काफ़िया मिलाने में कम से कम इस बात की गुंजाईश तो रहती है कि सामईन 'अच्छी कोशिश कहकर आपको मुआफ़ कर दें. लेकिन बगैर काफ़िये में इस बात का डर हमेशा बना रहता है कि 'ये क्या है' के पत्थर बरस सकते हैं. लेकिन आपकी कलम कमाल है. बागी काफ़िये के भी तरन्नुम कि लज़्ज़त है. विषय बेहद जाने - पहचाने...फिर भी अजनबी से.

अच्छा लगा. पुराने ज़ख्म खुल गए.

आपकी कवितायों से साफ़ हो जाता है कि आप केरल के हैं. हर दूसरे - तीसरे पृष्ठ पर उसकी हरियाली दिखती है. एक बुरी आदत है आपकी कवितायों में. गाहे - बगाहे माज़ी में ले जाते हैं. टीस सी उठती है. आह सी निकलती है. कहीं कुछ फिर से बिखर जाता है. वक़्त महबूबा सी जो होती है. एकबार रूठकर चली जाये तो लौटकर नहीं आती. बस उसकी याद आती है. आपकी कवितायेँ उसी सफ़र पर ले जाती हैं.
मुझे आप शायर कम फोटोग्राफर ज्यादा लगे, जो लफ़्ज़ों से फोटोग्राफी करता है. आपका हर फोटो अपने आप में तारीख़ है. मुझे यक़ीन है कि आज से दसेक साल बाद जब नयी पीढ़ी पुराने समाज कि तलाश करेगी, तो आपकी कवितायेँ इसे मरे, भूले - बिसराए समाज का पता बतायेंगी. जहाँ हाथ में छड़ी थामे मास्टरजी होंगे. मस्ती में झूमते बच्चे होंगे. उनके बसते होने और उनमे भी तमाम दुनिया होगी. लेकिन उतनी भरी नहीं, जितनी कि तब होगी. हम जैसों को भी अपने माज़ी में लौटने का शार्टकट मिलता रहेगा.

शुक्रिया हमारे दिल की बात कहने के लिए.

इति

रवि
फिल्मकार और कवि

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